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3 जन॰ 2019

क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग एक


यीशु के देहधारी होने के सत्य के विकसित होने के बाद ही मनुष्य इस बात को महसूस कर पाया: यह न केवल स्वर्ग का परमेश्वर है, बल्कि यह पुत्र भी है, और यहां तक कि वह आत्मा भी है। यह पारम्परिक धारणा है जिसे मनुष्य धारण किए हुए है, कि एक ऐसा परमेश्वर है जो स्वर्ग में हैः एक त्रित्व जो पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा है, और ये सभी एक में हैं। सभी मानवों की यही धारणाएं हैं: परमेश्वर केवल एक ही परमेश्वर है, परन्तु उसके तीन भाग हैं, जिसे कष्टदायक रूप से पारंपरिक धारणा में दृढ़ता से जकड़े सभी लोग पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा मानते हैं। केवल यही तीनों संपूर्ण परमेश्वर को बनाते हैं।

2 जन॰ 2019

क्या त्रित्व का अस्तित्व है? भाग दो


यह अधिकांश लोगों को उत्पत्ति से परमेश्वर के शब्दों को याद दिला सकता है: "हम मनुष्य को अपनी छवि में बनाएँ, हमारे समान।" यह देखते हुए कि परमेश्वर कहता है, "हम" मनुष्य को "अपनी" छवि में बनाएँ, तो "हम" इंगित करता है दो या अधिक; चूंकि उसने "हम" कहा, फिर सिर्फ एक ही परमेश्वर नहीं है। इस तरह, मनुष्य ने अलग व्यक्तियों की कल्पना पर विचार करना शुरू कर दिया, और इन शब्दों से पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का विचार उभरा। तो फिर पिता कैसा है? पुत्र कैसा है? और पवित्र आत्मा कैसा है? क्या संभवत: यह हो सकता है कि आज की मानवजाति एक ऐसी छवि में बनाई गई थी, जो तीनों से मिलकर बनती है?

20 दिस॰ 2018

परमेश्वर द्वारा आवासित देह का सार भाग एक


पहला देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर साढ़े तैंतीस साल रहा, फिर भी उसने अपनी सेवकाई को उन सालों में से केवल साढ़े तीन साल तक ही किया। अपना कार्य करने के दौरान और अपना कार्य आरम्भ करने से पहले, इन दोनों समयों में, वह अपनी सामान्य मानवता को धारण किए हुए था। वह अपनी साधारण मानवता में साढ़े तैंतीस साल तक रहा। पूरे साढ़े तीन साल तक उसने अपने आप को देहधारी परमेश्वर के रूप में प्रकट किया। अपनी सेवकाई का कार्य प्रारम्भ करने से पहले, अपनी दिव्यता का कोई भी चिन्ह प्रकट नहीं करते हुए, वह अपनी साधारण और सामान्य मानवता के साथ प्रकट हुआ, और यह केवल उसकी सेवकाई को औपचारिक तौर पर प्रारम्भ करने के बाद ही हुआ कि उसकी दिव्यता प्रदर्शित की गई थी।

18 दिस॰ 2018

परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है भाग एक


मानवजाति के प्रबंधन करने के कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है, जिसका अर्थ यह है कि मानवजाति को बचाने के कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है। इन चरणों में संसार की रचना का कार्य समाविष्ट नहीं है, बल्कि ये व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग और राज्य के युग के कार्य के तीन चरण हैं। संसार की रचना करने का कार्य, सम्पूर्ण मानवजाति को उत्पन्न करने का कार्य था। यह मानवजाति को बचाने का कार्य नहीं था, और मानवजाति को बचाने के कार्य से कोई सम्बन्ध नहीं रखता है, क्योंकि जब संसार की रचना हुई थी तब मानवजाति शैतान के द्वारा भ्रष्ट नहीं की गई थी, और इसलिए मानवजाति के उद्धार का कार्य करने की कोई आवश्यकता नहीं थी।

17 दिस॰ 2018

परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है भाग दो



परमेश्वर स्वयं का कार्य वह दर्शन है जो मनुष्य को अवश्य जानना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर का कार्य मनुष्यों के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है, और मनुष्यों के द्वारा धारण नहीं किया जाता है। कार्य के तीन चरण परमेश्वर के प्रबंधन की सम्पूर्णता हैं, और इससे बड़ा कोई दर्शन नहीं है जो मनुष्यों के द्वारा ज्ञात किया जाना चाहिए। यदि मनुष्य इस शक्तिशाली दर्शन को नहीं जानता है, तो परमेश्वर को जानना आसान नहीं है, और परमेश्वर की इच्छा को समझना आसान नहीं है, और, इसके अलावा, मनुष्य जिस मार्ग पर चलता है वह उत्तरोत्तर कठिन बन जाता है। दर्शन के बिना, मनुष्य इतनी दूर तक नहीं आ सकता था। ये दर्शन ही हैं जिन्होंने आज तक मनुष्य की सुरक्षा की है और जिन्होंने मनुष्य को सबसे बड़ा संरक्षण प्रदान किया है।

26 जून 2018

वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं

यीशु,ईसाई,इंजील,व्यवस्था का युग,अनुग्रह का युग

वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं

परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य, मनुष्यों में कैसा प्रभाव प्राप्त किया जाना है, और मनुष्य के प्रति परमेश्वर की इच्छा क्या है, को समझना यही सब बातें हर उस व्यक्ति को उपार्जित करनी चाहिए जो परमेश्वर का अनुसरण करता है। अभी सभी मनुष्यों में जिस चीज का अभाव है, वह है परमेश्वर के कार्य का ज्ञान। मनुष्य न बूझता है और न ही समझता है कि वास्तव में कौन सी चीज मनुष्य में परमेश्वर के कर्म, परमेश्वर के समस्त कार्य को, और सृष्टि की रचना के बाद से परमेश्वर की इच्छा को निर्मित करती है। यह अपर्याप्तता न केवल समस्त धार्मिक जगत में देखी जाती है, बल्कि इसके अलावा परमेश्वर के सभी विश्वासियों में भी देखी जाती है।

1. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना क्या है? अगर कोई केवल प्रभु के लिए मिशनरी (धर्म-प्रचार सम्बन्धी) काम करता है, तो क्या यह परमेश्वर की इच्छा का पालन करना है?

XVIII. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण क्या है और परमेश्वर में विश्वास की सच्ची गवाही क्या है, इस पर हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाह...