स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग सात
कोई भी इस तथ्य को नहीं बदल सकता है कि परमेश्वर मानव की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता है
जो सब मैंने अभी कहा वह सुनने के बाद, क्या नियति के विषय में तुम लोगों का विचार बदला है? तुम सब मानव की नियति के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को किस प्रकार समझते हो? इसे साधारण रूप से कहें, तो परमेश्वर के अधिकार के अधीन प्रत्येक व्यक्ति सक्रियता से या निष्क्रियता से उसकी संप्रभुता एवं इंतज़ामों को स्वीकार करता है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस प्रकार अपने जीवन के पथक्रम मे ंघर्ष करता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह कितने टेढ़े-मेढ़े पथों पर चलता है, क्योंकि अंत में वह नियति की परिक्रमा-पथ पर वापस लौट आएगा जिसे सृष्टिकर्ता ने उस पुरुष या स्त्री के लिए चिन्हित किया है। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार की अजेयता है, और वह रीति है जिसके तहत उसका अधिकार विश्व पर नियन्त्रण एवं शासन करता है।