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16 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग सात



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग सात


कोई भी इस तथ्य को नहीं बदल सकता है कि परमेश्वर मानव की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता है
जो सब मैंने अभी कहा वह सुनने के बाद, क्या नियति के विषय में तुम लोगों का विचार बदला है? तुम सब मानव की नियति के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को किस प्रकार समझते हो? इसे साधारण रूप से कहें, तो परमेश्वर के अधिकार के अधीन प्रत्येक व्यक्ति सक्रियता से या निष्क्रियता से उसकी संप्रभुता एवं इंतज़ामों को स्वीकार करता है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस प्रकार अपने जीवन के पथक्रम मे ंघर्ष करता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह कितने टेढ़े-मेढ़े पथों पर चलता है, क्योंकि अंत में वह नियति की परिक्रमा-पथ पर वापस लौट आएगा जिसे सृष्टिकर्ता ने उस पुरुष या स्त्री के लिए चिन्हित किया है। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार की अजेयता है, और वह रीति है जिसके तहत उसका अधिकार विश्व पर नियन्त्रण एवं शासन करता है।

15 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग छे



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग छे

4. सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन आ जाओ और शान्ति से मृत्यु का सामना करो
उस घड़ी जब किसी व्यक्ति का जन्म होता है, तब एक अकेला आत्मा इस पृथ्वी पर जीवन के विषय में अपने अनुभवऔर सृष्टिकर्ता के अधिकार के विषय में अपने अनुभव का प्रारम्भ करता है जिसे सृष्टिकर्ता ने उसके लिए व्यवस्थित किया है। कहने की आवश्यकता नहीं है, उस व्यक्ति, अर्थात् उस आत्मा, के लिए यह सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के ज्ञान को अर्जित करने के लिए, और उसके अधिकार को जानने और व्यक्तिगत तौर पर इसका अनुभव करने के लिए सबसे उत्तम अवसर है। लोग नियति के नियमों के अधीन अपने जीवन को जीते हैं जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा उनके लिए व्यवस्थित किया गया है, और किसी भी न्यायसंगत व्यक्ति के लिए जिसके पास विवेक है, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करना और पृथ्वी पर मनुष्यों के कई दशकों के जीवनक्रम के ऊपर उसके अधिकार को पहचानना कोई कठिन कार्य नहीं है कि उसे किया न जा सके।

14 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग पांच



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग पांच

मृत्यु: छठवां घटनाक्रम
इतनी अफरा-तफरी के पश्चात्, इतनी कुंठाओं एवं निराशाओं के पश्चात्, इतने सारे सुखों एवं दुखों और उतार एवं चढ़ावों के पश्चात्, इतने सारे अविस्मरणीय वर्षों के पश्चात्, बार बार ऋतुओं को परिवर्तित होते हुए देखने के पश्चात्, कोई व्यक्ति बिना ध्यान दिए ही जीवन के महत्वपूर्ण मील के पत्थरों को पार कर जाता है, और बिजली के चमकते ही वह स्वयं को अपने जीवन के ढलते हुए वर्षों में पाता है। समय के चिन्हों से उसके सारे शरीर पर मुहर लगाई गई है: वह अब आगे से सीधा खड़ा नहीं हो सकता है, घने काले बालों वाला सिर अब सफेद, एवं चमकदार हो गया है, चमकीली आंखें धुंधली हो गई हैं एवं अँधेरा छा गया है, चिकनी एवं कोमल त्वचा झुर्रीदार एवं दागदार हो गई है। उसकी सुनने की शक्ति कमज़ोर हो गई है, उसके दांत ढीले हो गए हैं एवं गिर गए हैं, उसकी प्रतिक्रियाएं धीमी हो गई हैं, उसकी गतिविधियां सुस्त हो गई हैं। इस मुकाम पर, उसने अपनी जवानी के जोशीले दिनों को पूरी तरह से अलविदा कह दिया है और अपने जीवन की सांझ की हलकी रौशनी में प्रवेश किया है: बुढ़ापा। इसके आगे, वह मृत्यु का सामना करेगा, किसी मानव के जीवन का अंतिम घटनाक्रम।

13 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग चार



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग चार

सन्तान: पाँचवां घटनाक्रम
विवाह करने के पश्चात्, कोई व्यक्ति अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करने में लग जाता है। कोई यह नहीं कह सकता कि उसके पास कितने एवं किस प्रकार के संतान होंगे; यह किसी की नियति द्वारा निर्धारित होता है, सृष्टिकर्ता द्वारा पूर्वनिर्धारित होता है। यह पाँचवां घटनाक्रम है जिससे होकर किसी व्यक्ति को गुज़रना होगा।
यदि किसी व्यक्ति ने किसी और बच्चे की भूमिका को पूरा करने के लिए जन्म लिया है, तो वह किसी और के माता पिता की भूमिका पूरा करने के लिए अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करता है। भूमिकाओं का यह स्थानान्तरण किसी व्यक्ति को अलग अलग दृष्टिकोण से जीवन के अलग अलग पहलुओं का अनुभव कराता है। साथ ही यह किसी व्यक्ति को जीवन के अनुभवों के विभिन्न संग्रह प्रदान करता है, जिसमें वह सृष्टिकर्ता की उसी संप्रभुता को जान पाता है, साथ ही साथ उस तथ्य को जान पाता है कि कोई भी व्यक्ति सृष्टिकर्ता के पूर्वनिर्धारण का अतिक्रमण या उसे पलट नहीं सकता है।

3 मार्च 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग आठ


13. अपने पुनरूत्थान के बाद यीशु रोटी खाता है और पवित्र शास्त्र को समझाता है
(लूका 24:30-32) जब वह उनके साथ भोजन करने बैठा, तो उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया और उसे तोड़कर उनको देने लगा। तब उनकी आँखें खुल गईं; और उन्होंने उसे पहचान लिया, और वह उनकी आँखों से ओझल हो गया। उन्होंने आपस में कहा, "जब वह मार्ग में हमसे बातें करता था और पवित्रशास्त्र का अर्थ हमें समझाता था, तो क्या हमारे मन में उत्तेजना न उत्पन्न हई?"
14. चेलों ने यीशु को खाने के लिए भूनी हुई मछली दी
(लूका 24:36-43) वे ये बातें कह ही रहे थे कि वह आप ही उनके बीच में आ खड़ा हुआ, और उनसे कहा, "तुम्हें शांति मिले।" परन्तु वे घबरा गए, और डर गए, और समझे कि हम किसी आत्मा को देख रहे हैं। उसने उनसे कहा, "क्यों घबराते हो? और तुम्हारे मन में क्यों सन्देह उठते हैं? मेरे हाथ और मेरे पाँव को देखो कि मैं वही हूँ। मुझे छूकर देखो, क्योंकि आत्मा के हड्डी माँस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो।" यह कहकर उसने उन्हें अपने हाथ पाँव दिखाए। जब आनन्द के मारे उनको प्रतीति न हुई, और वे आश्चर्य करते थे, तो उसने उनसे पूछा, "क्या यहाँ तुम्हारे पास कुछ भोजन है?" उन्होंने उसे भुनी हुई मछली का टुकड़ा दिया और एक शहद का छत्ता दिया। उसे लेकर उनके सामने खाया।

2 मार्च 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग सात


अब आओ हम नीचे दिए पवित्र शास्त्र के अंश को पढ़ें
12. अपने पुनरूत्थान के बाद अपने चेलों के लिए यीशु के वचन
(यूहन्ना 20: 26-29) आठ दिन के बाद उसके चेले फिर घर के भीतर थे, और थोमा उनके साथ था; और द्वार बंद थे, तब यीशु आया और उनके बीच में खड़े होकर कहा, "तुम्हें शान्ति मिले।" तब उसने थोमा से कहा, "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्वासी नहीं परंतु विश्वासी हो।" यह सुन थोमा ने उत्तर दिया, "हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्वर! यीशु ने उससे कहा, तू ने मुझे देखा है, क्या इसलिए विश्वास किया है, धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया।"

1 मार्च 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग छे:


10. फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना
(मरकुस 3:21-22) जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो उसे पकड़ने के लिए निकले; क्योंकि वे कहते थे कि उसका चित ठिकाने नहीं है। शास्त्री भी जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, कि "उसमें शैतान है," और "वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है।"
11. यीशु फरीसियों को डाँटता है
(मत्ती12:31-32) इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निंदा क्षमा की जाएगी, पर पवित्र आत्मा की निंदा क्षमा न की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।
(मत्ती23:13-15) हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो तुम स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उसमें प्रवेश करने वालों को प्रवेश करने देते हो। हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा। हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिए सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

28 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग पांच


आगे, आओ हम पवित्र शास्त्र के निम्नलिखित अंश को देखें।
9.यीशु अद्भुत काम करता है।
1) यीशु पाँच हज़ार को भोजन कराता है
(यूहन्ना 6:8-13) उसके चेलों में से शमौन पतरस के भाई अन्द्रियास ने उससे कहा, "यहाँ एक लड़का है जिसके पास जौ की पाँच रोटी और दो छोटी मछलियाँ हैं; परन्तु इतने लोगों के लिए वे क्या हैं?" यीशु ने कहा, "लोगों को बैठा दो।" उस जगह बहुत घास थी। तब लोग जिनकी संख्या लगभग पाँच हज़ार की थी, बैठ गए। तब यीशु ने रोटियाँ लीं, और धन्यवाद करके बैठने वालों को बाँट दीं; और वैसे ही मछलियों में से जितनी वे चाहते थे बाँट दिया। जब वे खाकर तृप्त हो गए तो उसने अपने चेलों से कहा, "बचे हुए टुकड़े बटोर लो कि कुछ फेंका ना जाए।" अत: उन्होंने बटोरा, और जौ की पाँच रोटियों के टुकड़ों से जो खाने वालों से बच रहे थे, बारह टोकरियाँ भरीं।

27 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग चार


आगे, आओ इन निम्नलिखित अंशों को पढ़ें।
6. पहाड़ी उपदेश
1) धन्य वचन (मत्ती 5:3-12)
2) नमक और ज्योति (मत्ती 5:13-16)
3) व्यवस्था (मत्ती 5:17-20)
4) क्रोध (मत्ती 5:21-26)
5) व्यभिचार (मत्ती 5:27-30)
6) तलाक (मत्ती 5:31-32)
7) मन्नतें (मत्ती 5:33-37)
8) आँख के बदले आँख (मत्ती 5:38-42)
9) अपने शत्रुओं से प्रेम करो (मत्ती 5:43-48)
10) देने के विषय निर्देश (मत्ती 6:1-4)
11) प्रार्थना (मत्ती 6:5-8)
7. प्रभु यीशु के दृष्टान्त
1) बीज बोनेवाले का दृष्टान्त (मत्ती 13:1-9)
2) जंगली पौधों का दृष्टान्त (मत्ती 13:24-30)
3) राई के दाने का दृष्टान्त (मत्ती 13:31-32)
4) खमीर का दृष्टान्त (मत्ती 13:33)
5) जंगली बीजों के दृष्टान्त की व्याख्या (मत्ती 13:36-43)
6) अनमोल धन का दृष्टान्त (मत्ती13:44)
7) अनमोल मोती का दृष्टान्त (मत्ती13:45-46)
8) जाल का दृष्टान्त (मत्ती 13:47-50)
8. आज्ञाएँ

26 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग तीन


3. खोई हुई भेड़ का दृष्टान्त
(मत्ती18:12-14) क्या तुम समझते हो? यदि किसी मनुष्य की सौ भेड़ें हों, और उनमें से एक भटक जाए, तो क्या वह निन्यानवे को छोड़कर, और पहाड़ों पर जाकर, उस भटकी हुई को ना ढूँढ़ेगा? और यदि ऐसा हो कि उसे पाए, तो मैं तुम से सच कहता हूँ, कि वह उन निन्यानवे भेडों के लिए जो भटकी नहीं थी, इतना आनन्द नहीं करेगा जितना कि इस भेड़ के लिए करेगा। ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्ट हो।

25 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग दो के क्रम में


आगे, आओ हम पवित्र शास्त्र के इस अंश के इस अन्तिम वाक्य पर एक नज़र डालें: "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।" क्या इस वाक्य का एक व्यावहारिक पहलू है? क्या तुम लोग इसके व्यावहारिक पहलू को देख सकते हो? हर एक बात जो परमेश्वर कहता है उसके हृदय से आती है, तो उसने ऐसा क्यों कहा? तुम लोग इसे कैसे समझते हो? तुम लोग शायद इस वाक्य का अर्थ अब समझते हो, परन्तु उस समय बहुत से लोग नही समझते थे क्योंकि मनुष्यजाति बस उसी समय व्यवस्था के युग से बाहर निकली थी। उनके लिए, सब्त से बाहर निकलना एक कठिन बात थी, और सच्चे सब्त को समझने का तो जिक्र भी नहीं कर सकते थे।

24 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग दो


हमने बस अभी अभी उस समस्त कार्य के बारे में बात की है जिसे परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया गया था, ऐसी चीज़ों का क्रम जिसे उसने पहली बार किया था। इन चीज़ों में से प्रत्येक परमेश्वर के प्रबन्धकीय योजना, और परमेश्वर की इच्छा से सम्बन्धित है। वे स्वयं परमेश्वर के स्वभाव और उसके सार से सम्बन्धित हैं। यदि हम और अच्छे से जो परमेश्वर के पास है तथा जो परमेश्वर है उसे समझना चाहते हैं, तो हम पुराने नियम या व्यवस्था के युग तक नहीं रूकेंगे, किन्तु हमें उन कदमों के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है जिन्हें परमेश्वर ने अपने कार्य के दौरान उठाया था। इस प्रकार, जब परमेश्वर ने व्यवस्था के युग का अन्त किया और अनुग्रह के युग का शुभारम्भ किया है, तो हमारे स्वयं के कदम अनुग्रह के युग में पधार चुके हैं—एक ऐसा युग जो अनुग्रह और छुटकारे से भरपूर है।

23 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग एक


इन अनेक सभाओं ने प्रत्येक व्यक्ति पर एक बड़ा प्रभाव डाला है। अब तक तो, लोग वास्तव में परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व का एहसास कर पाये होंगे और यह कि परमेश्वर वास्तव में उन के अति निकट है। यद्यपि लोगों ने बहुत सालों से परमेश्वर पर विश्वास किया है, फिर भी उन्होंने उसके विचारों और युक्तियों को सचमुच में कभी भी वैसा नहीं समझा है जैसा वे अब समझते हैं, और ना ही उन्होंने उसके व्यावहारिक कार्यों को सचमुच में वैसा अनुभव किया है जैसा वे अब करते हैं। चाहे उस का ज्ञान हो या वास्तविक अभ्यास, अधिकतर लोगों ने कुछ नया सीखा है और एक ऊँची समझ को प्राप्त किया है, और भूतकाल में जो कुछ वे स्वयं कर रहे थे उसमें हुई ग़लती को महसूस किया है, अपने अनुभव के छिछलेपन का एहसास किया है और यह कि किसी चीज़ की अधिकता परमेश्वर के इच्छानुसार नहीं होता है, और यह महसूस किया कि जिस बात की मनुष्य में सब से ज़्यादा कमी है वह है परमेश्वर के स्वभाव का ज्ञान।

22 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II भाग सात के क्रम में


हालाँकि उस समय उसकी आशीषें केवल भेड़-बकरियों, गाय-बैलों, ऊंटों, भौतिक सम्पत्तियों, इत्यादि तक ही सीमित थीं, फिर भी वे आशीषें जिन्हें परमेश्वर अपने हृदय में अय्यूब को प्रदान करना चाहता था वे इनसे कहीं बढ़कर थीं। उस समय क्या इस बात को दर्ज किया गया था कि परमेश्वर किस प्रकार की अनन्त प्रतिज्ञाएं अय्यूब को देना चाहता था? अय्यूब के विषय में परमेश्वर कि आशीषों में, परमेश्वर ने उसकी आशीषों का जिक्र नहीं किया या उसे स्पर्श नहीं किया, और इसके बावजूद कि अय्यूब परमेश्वर के हृदय में क्या महत्व एवं स्थान रखता था, कुल मिलाकर परमेश्वर अपनी आशीषों के विषय में विवेकशील था। परमेश्वर ने अय्यूब के अंत की घोषणा नहीं की। इसका क्या अर्थ है? उस समय, जब परमेश्वर की योजना मनुष्य के अंत की घोषणा के बिन्दु तक नहीं पहुंची थी, और उस योजना ने उसके कार्य के अंतिम चरण में प्रवेश नहीं किया था, तब तक परमेश्वर ने अंत का कोई जिक्र नहीं किया था, उसने महज मनुष्य को भौतिक आशीषें ही प्रदान की थीं। इसका अर्थ है कि अय्यूब का बाकी का आधा जीवन परमेश्वर की आशीषों के मध्य गुज़रा था, यही वह बात थी जिसने उसे दूसरों से अलग किया था—परन्तु उनके समान ही उसकी उम्र बढ़ने लगी, और किसी भी सामान्य व्यक्ति के समान ही वह दिन भी आया जब उसने संसार को अलविदा कहा।

21 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II भाग सात


अय्यूब की परीक्षाओं के अंत के बाद उसकी गवाही को प्राप्त करने के पश्चात्, परमेश्वर ने यह दृढ़ निश्चय किया था कि वह अय्यूब के समान एक समूह—या एक से अधिक समूह—को हासिल करेगा, फिर भी उसने यह दृढ़ निश्चय किया था कि वह फिर कभी शैतान को अनुमति नहीं देगा कि वह उन माध्यमों का उपयोग करके किसी और का शोषण करे जिनके द्वारा शैतान ने परमेश्वर के साथ शर्त लगाकर अय्यूब की परीक्षा ली थी, उस पर आक्रमण किया था और उसका शोषण किया था; परमेश्वर ने शैतान को अनुमति नहीं दी थी कि वह फिर कभी मनुष्य के साथ ऐसी चीज़ें करे, जो कमज़ोर, मूर्ख एवं अज्ञानी है—इतना काफी था कि शैतान ने अय्यूब की परीक्षा ली थी!

20 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II भाग छे: के क्रम में


अय्यूब ने परमेश्वर के चेहरे को नहीं देखा था, या परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों को नहीं सुना था, और उसने व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के कार्य का अनुभव तो बिलकुल भी नहीं किया था, परन्तु परमेश्वर के प्रति उसके भय एवं अपनी परीक्षाओं के मध्य उसकी गवाही को सभी लोगों के द्वारा देखा गया था, और परमेश्वर के द्वारा उनसे प्रेम किया गया है, उनमें आनन्द मनाया गया है, और उनकी प्रशंसा की गई है, और लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं और उनकी तारीफ करते हैं, और इसके अतिरिक्त, उनका गुणगान करते हैं।

19 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II भाग छे: के क्रम में




यदि अब मैं तुम लोगों को कहूँ कि अय्यूब बहुत ही प्यारा इंसान था, तो तुम लोग इन शब्दों के भीतर के अर्थ को नहीं समझ सकते हो, और मैं ने इन सभी चीज़ों को क्यों कहा है कि तुम लोग इसके पीछे की उस भावना का आभास नहीं कर सकते हो; परन्तु उस दिन तक इंतज़ार करो जब तुम लोग वैसी ही या अय्यूब के समान ही उन परीक्षाओं का अनुभव कर चुके होगे, जब तुम लोग विपरीत परिस्थिति से होकर गुज़र चुके होगे, जब तुम लोगों ने उन परीक्षाओं का अनुभव कर लिया होगा जिन्हें परमेश्वर के द्वारा व्यक्तिगत रूप से तुम लोगों के लिए नियोजित किया गया था, जब तू सब कुछ दे देगा, और परीक्षाओं के मध्य शैतान के ऊपर प्रबल होने और परमेश्वर के लिए गवाही देने के लिए अपमान एवं क्लेश सहेगा—तब तू इन वचनों के अर्थ को समझेगा जिन्हें मैंने कहा था।

18 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II भाग पांच के क्रम में


आओ हम निम्नलिखित अंश को पढ़ें: "तब शैतान यहोवा के सामने से निकला, और अय्यूब को पाँव के तलवे से ले सिर की चोटी तक बड़े बड़े फोड़ों से पीड़ित किया। तब अय्यूब खुजलाने के लिये एक ठीकरा लेकर राख पर बैठ गया" (अय्यूब 2:7-8)। यह अय्यूब के आचरण का चित्रण है जब उसके शरीर पर फोड़े निकल आए थे। इस समय, अय्यूब दर्द सहते हुए राख पर बैठ गया। किसी ने भी उससे व्यवहार नहीं की, और किसी ने भी उसके शरीर के दर्द को कम करने के लिए सहायता नहीं की; इसके बजाए, उसने अपने फोड़ों की सतह को खुजाने के लिए एक ठीकरे का इस्तेमाल किया।

17 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II भाग पांच


अय्यूब के विषय में
अय्यूब किस प्रकार परीक्षाओं से होकर गुज़रा था इन बातों को सीखने के बाद, तुम में से अधिकांश लोग संभवतः अय्यूब के विषय में और भी अधिक ब्योरों को जानना चाहोगे, खासतौर पर उस रहस्य के सम्बन्ध में जिसके द्वारा उसने परमेश्वर की प्रशंसा को हासिल किया था। अतः आज, आओ हम अय्यूब के बारे में बात करें!

16 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II भाग चार के क्रम में


अय्यूब के द्वारा सही गई कठिनाईयां परमेश्वर के द्वारा भेजे गए स्वर्गदूतों का कार्य नहीं था, न ही इसे परमेश्वर के हाथ के द्वारा किया गया था। इसके बजाए, इसे शैतान के द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया था, जो परमेश्वर का शत्रु है। परिणामस्वरूप, अय्यूब के द्वारा सही गई कठिनाईयों का स्तर अत्याधिक गहरा था। फिर भी इस समय अय्यूब ने बिना किसी संशय के अपने हृदय में परमेश्वर के विषय में अपने प्रतिदिन के ज्ञान को, प्रतिदिन के कार्यों के सिद्धान्तों को, और परमेश्वर के प्रति अपनी मनोवृत्ति को प्रदर्शित किया था—और यही वह सच्चाई है।

1. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना क्या है? अगर कोई केवल प्रभु के लिए मिशनरी (धर्म-प्रचार सम्बन्धी) काम करता है, तो क्या यह परमेश्वर की इच्छा का पालन करना है?

XVIII. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण क्या है और परमेश्वर में विश्वास की सच्ची गवाही क्या है, इस पर हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाह...