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28 अग॰ 2019

मसीह के कथन "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है: परमेश्वर का अधिकार" (उद्धरण, मंच पर सस्वर पाठ)


मसीह के कथन "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है: परमेश्वर का अधिकार" (उद्धरण, मंच पर सस्वर पाठ)


सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "परमेश्वर का अधिकार हर जगह, हर घण्टे, और हर एक क्षण है। यदि स्वर्ग और पृथ्वी समाप्त जाएँ, तब भी उसका अधिकार कभी समाप्त नहीं होगा, क्योंकि वह स्वयं परमेश्वर है, वह अद्वितीय अधिकार धारण करता है, और उसका अधिकार लोगों, घटनाओं या चीज़ों के द्वारा, अंतरीक्ष के द्वारा या भूगोल के द्वारा प्रतिबन्धित या सीमित नहीं होता है। परमेश्वर हमेशा अपने अधिकार को काम में लाता है, अपनी ताक़त दिखाता है, हमेशा की तरह अपने प्रबंधन के कार्य को करता रहता है; वह हमेशा सभी चीज़ों के ऊपर शासन करता है, सभी चीज़ों का भरण-पोषण करता है, और सभी चीज़ों का आयोजन करता है, ठीक वैसे ही जैसे उसने हमेशा से किया था। इसे कोई नहीं बदल सकता है। यह एक तथ्य है; यह आदि काल से अपरिवर्तनीय सत्य है।"

सम्बन्धित सामग्री:प्रार्थना की शक्ति, आइए वास्तविक जीवन में परमेश्वर की सर्वशक्तिमानता और संप्रभुता को जानें।

20 अग॰ 2019

1. वह सच्चा परमेश्वर जिसने आकाश, पृथ्वी और सब कुछ बनाया है, एक है या तीन है?

XVI. हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाहिए कि परमेश्वर वास्तव में त्रिविध परमेश्वर है, या एक ही सच्चा परमेश्वर है

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया-परमेश्वर की गवाही देते बीस सत्य, परमेश्वर को जानना, परमेश्वर के शासन
1. वह सच्चा परमेश्वर जिसने आकाश, पृथ्वी और सब कुछ बनाया है, एक है या तीन है?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद:
"फिलिप्पुस ने उससे कहा, 'हे प्रभु, पिता को हमें दिखा दे, यही हमारे लिये बहुत है।' यीशु ने उससे कहा, 'हे फिलिप्पुस, मैं इतने दिन से तुम्हारे साथ हूँ, और क्या तू मुझे नहीं जानता? जिसने मुझे देखा है उसने पिता को देखा है। तू क्यों कहता है कि पिता को हमें दिखा? क्या तू विश्‍वास नहीं करता कि मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है? ये बातें जो मैं तुम से कहता हूँ, अपनी ओर से नहीं कहता, परन्तु पिता मुझ में रहकर अपने काम करता है'" (युहन्ना 14:8-10)।
"मैं और पिता एक हैं" (यूहन्ना 10:30)।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:
परमेश्वर वह है जो सभी चीज़ों पर राज्य करता है, और सभी चीज़ों का प्रबंधन करता है। जो कुछ है वह उसी ने रचा है, जो कुछ है उसकी व्यवस्था वही करता है और जो कुछ है उस पर वही राज्य करता है और सभी चीज़ें उसी के द्वारा पोषित होती हैं। यह परमेश्वर का पद और पहचान है। सभी चीजों के लिए और सब कुछ जो है, परमेश्वर की असली पहचान सृष्टिकर्ता की है, और वह सभी चीज़ों का शासक है। इस प्रकार की पहचान परमेश्वर की है और वह सभी बातों में अद्वितीय है। परमेश्वर की कोई भी रचना - चाहे वह मनुष्य के मध्य हो या आत्मिक दुनिया में होः किसी भी साधन या बहाने का उपयोग करके परमेश्वर की पहचान और पद को परमेश्वर का वेष धारण करने या हटाने के लिए नहीं किया जा सकता, क्योंकि सभी बातों में वह ही एक है जो इस पहचान, शक्ति, अधिकार, और सभी बातों पर राज्य करने की योग्यता को अपने अधीन रखता है: हमारा अद्वितीय परमेश्वर स्वयं।

1 अग॰ 2019

3. व्यवस्था के युग में नबियों के द्वारा दिए गए परमेश्वर के वचनों और देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्त परमेश्वर के वचनों में क्या अंतर है?

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया-परमेश्वर की गवाही देते बीस सत्य, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर के शासन

3. व्यवस्था के युग में नबियों के द्वारा दिए गए परमेश्वर के वचनों और देहधारी परमेश्वर द्वारा व्यक्त परमेश्वर के वचनों में क्या अंतर है?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:
अनुग्रह के युग में, यीशु ने भी काफ़ी बातचीत की और काफ़ी कार्य किया। वह यशायाह से किस प्रकार भिन्न था? वह दानिय्येल से किस प्रकार भिन्न था? क्या वह कोई भविष्यद्वक्ता था? ऐसा क्यों कहा जाता है कि वह मसीह है? उनके मध्य क्या भिन्नताएँ हैं? वे सभी मनुष्य थे जिन्होंने वचन बोले थे, और मनुष्य को उनके वचन लगभग एक से प्रतीत होते थे। उन सभी ने बातें की और कार्य किए। पुराने विधान के भविष्यवद्क्ताओं ने भविष्यवाणियाँ की, और उसी तरह से, यीशु भी वैसा ही कर सका। ऐसा क्यों है? यहाँ कार्य की प्रकृति के आधार पर भिन्नता है। इस मामले को समझने के लिए, तुम देह की प्रकृति पर विचार नहीं कर सकते हो और तुम्हें किसी व्यक्ति के वचनों की गहराई या सतहीपन पर विचार नहीं करना चाहिए। तुम्हें अवश्य हमेशा सबसे पहले उसके कार्य पर और उन प्रभावों पर विचार करना चाहिए जिसे उसका कार्य मनुष्य में प्राप्त करता है। उस समय यशायाह के द्वारा कही गई भविष्यवाणियों ने मनुष्य का जीवन प्रदान नहीं किया, और दानिय्येल जैसे लोगों द्वारा प्राप्त किए गए संदेश मात्र भविष्यवाणियाँ थीं न कि जीवन का मार्ग थीं। यदि यहोवा की ओर से प्रत्यक्ष प्रकाशन नहीं होता, तो कोई भी इस कार्य को नहीं कर सकता था, क्योंकि यह नश्वरों के लिए सम्भव नहीं है। यीशु, ने भी, बहुत बातें की, परन्तु वे वचन जीवन का मार्ग थे जिसमें से मनुष्य अभ्यास का मार्ग प्राप्त कर सकता था।

23 जुल॰ 2019

5. परमेश्वर कैसे पूरे ब्रह्मांड पर प्रभुत्व रखता है और प्रशासन करता है?


X. परमेश्वर को कैसे जाना जाए, इससे सम्बंधित सच्चाई के पहलू पर हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाहिए

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया-परमेश्वर के शासन,परमेश्वर का कार्य,परमेश्वर को जानना

5. परमेश्वर कैसे पूरे ब्रह्मांड पर प्रभुत्व रखता है और प्रशासन करता है?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:
इस विशाल ब्रह्मांड में ऐसे कितने प्राणी हैं जो सृष्टि के नियम का बार-बार पालन करते हुए, एक ही निरंतर नियम पर चल रहे हैं और प्रजनन कार्य में लगे हैं। जो लोग मर जाते हैं वे जीवितों की कहानियों को अपने साथ ले जाते हैं और जो जीवित हैं वे मरे हुओं के वही त्रासदीपूर्ण इतिहास को दोहराते रहते हैं। मानवजाति बेबसी में स्वयं से पूछती हैः हम क्यों जीवित हैं? और हमें करना क्यों पडता है? यह संसार किसके आदेश पर चलता है? मानवजाति को किसने रचा है? क्या वास्तव में मानवजाति प्रकृति के द्वारा ही रची गई है? क्या मानवजाति वास्तव में स्वयं के भाग्य के नियंत्रण में है? ... मनुष्य नहीं जानता कि ब्रह्मांड की सत्ता किसके पास है, मानवजाति की उत्पत्ति और भविष्य तो वह बिल्कुल नहीं जानता। मानवजाति सिर्फ मजबूरन इन नियमों के अधीन रहती है। न तो इससे कोई बच सकता है और न ही कोई इसे बदल सकता है, क्योंकि इन सबके मध्य और स्वर्ग में केवल एक ही शाश्वत सत्ता है जो सभी पर अपनी सम्प्रभुता रखती है।

21 जुल॰ 2019

3. परमेश्वर की सर्वशक्तिमानता और ज्ञान मुख्यतः किन पहलुओं में प्रकट हैं?




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3. परमेश्वर की सर्वशक्तिमानता और ज्ञान मुख्यतः किन पहलुओं में प्रकट हैं?
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:
परमेश्वर के वचन अधिकार हैं, परमेश्वर के वचन प्रमाणित सत्य हैं, और उसके मुँह से वचन के निकलने से पहले ही, दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर कुछ करने का निर्णय लेता है, तब ही उस चीज़ को पहले से ही पूरा करा जा चुका होता है।
"वचन देह में प्रकट होता है" से "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से
सृष्टिकर्ता का अधिकार और सामर्थ हर उस नई चीज़ में प्रगट हुआ जिसे उसने बनाया था, और उसके वचन और उपलब्धियाँ बिना किसी लेश मात्र विरोद्ध, और बिना किसी लेश मात्र अन्तराल के एक साथ घटित होती हैं। इन सभी नई चीज़ों का प्रकटीकरण और जन्म सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ के प्रमाण थे; वह अपने वचन के समान ही भला है, और उसका वचन पूरा होगा, और जो पूर्ण हुआ है वो हमेशा बना रहेगा। यह सच्चाई कभी नहीं बदलीः यह भूतकाल में ऐसा था, यह वर्तमान में ऐसा है, और पूरे अनंतकाल के लिए भी ऐसा ही बना रहेगा।
"वचन देह में प्रकट होता है" से "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I" से

22 मई 2019

भाग्य से जूझने के उन दिनों को विदाई

सत्यइशिन
एक पिछड़ा हुआ देहाती गाँव, अपने काम से थके हुए मेरे माता-पिता, वित्तीय कठिनाइयों का एक जीवन... मेरे युवा दिमाग पर इन उदास यादों की छाप पड़ी हुई थी, "भाग्य" के बारे में यह मेरी पहली धारणा थी। स्कूल जाना शुरू करने के बाद, जब मैंने पहली बार मेरे शिक्षक को यह कहते हुए सुना कि "तुम अपने भाग्य को अपने ही हाथों से नियंत्रित करते हो", तो मैंने इन शब्दों को दृढ़ता से मेरे मानस में रख लिया। मेरा मानना था कि हालांकि मैं इस तथ्य को नहीं बदल सकती थी कि मैं गरीबी में पैदा हुई थी, फिर भी कड़ी मेहनत के द्वारा मैं अपने भाग्य को बदल सकती थी। परिणामस्वरूप, अपने "भाग्य" के साथ कुश्ती करने के लिए और स्वर्ग का एक ऐसा टुकड़ा हासिल करने के लिए जिसे मैं अपना कह सकूँ, मैंने अपना पूरा ज़ोर लगा दिया।

16 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग सात



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग सात


कोई भी इस तथ्य को नहीं बदल सकता है कि परमेश्वर मानव की नियति के ऊपर संप्रभुता रखता है
जो सब मैंने अभी कहा वह सुनने के बाद, क्या नियति के विषय में तुम लोगों का विचार बदला है? तुम सब मानव की नियति के ऊपर परमेश्वर की संप्रभुता के तथ्य को किस प्रकार समझते हो? इसे साधारण रूप से कहें, तो परमेश्वर के अधिकार के अधीन प्रत्येक व्यक्ति सक्रियता से या निष्क्रियता से उसकी संप्रभुता एवं इंतज़ामों को स्वीकार करता है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह किस प्रकार अपने जीवन के पथक्रम मे ंघर्ष करता है, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वह कितने टेढ़े-मेढ़े पथों पर चलता है, क्योंकि अंत में वह नियति की परिक्रमा-पथ पर वापस लौट आएगा जिसे सृष्टिकर्ता ने उस पुरुष या स्त्री के लिए चिन्हित किया है। यह सृष्टिकर्ता के अधिकार की अजेयता है, और वह रीति है जिसके तहत उसका अधिकार विश्व पर नियन्त्रण एवं शासन करता है।

15 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग छे



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग छे

4. सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन आ जाओ और शान्ति से मृत्यु का सामना करो
उस घड़ी जब किसी व्यक्ति का जन्म होता है, तब एक अकेला आत्मा इस पृथ्वी पर जीवन के विषय में अपने अनुभवऔर सृष्टिकर्ता के अधिकार के विषय में अपने अनुभव का प्रारम्भ करता है जिसे सृष्टिकर्ता ने उसके लिए व्यवस्थित किया है। कहने की आवश्यकता नहीं है, उस व्यक्ति, अर्थात् उस आत्मा, के लिए यह सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के ज्ञान को अर्जित करने के लिए, और उसके अधिकार को जानने और व्यक्तिगत तौर पर इसका अनुभव करने के लिए सबसे उत्तम अवसर है। लोग नियति के नियमों के अधीन अपने जीवन को जीते हैं जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा उनके लिए व्यवस्थित किया गया है, और किसी भी न्यायसंगत व्यक्ति के लिए जिसके पास विवेक है, सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करना और पृथ्वी पर मनुष्यों के कई दशकों के जीवनक्रम के ऊपर उसके अधिकार को पहचानना कोई कठिन कार्य नहीं है कि उसे किया न जा सके।

14 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग पांच



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग पांच

मृत्यु: छठवां घटनाक्रम
इतनी अफरा-तफरी के पश्चात्, इतनी कुंठाओं एवं निराशाओं के पश्चात्, इतने सारे सुखों एवं दुखों और उतार एवं चढ़ावों के पश्चात्, इतने सारे अविस्मरणीय वर्षों के पश्चात्, बार बार ऋतुओं को परिवर्तित होते हुए देखने के पश्चात्, कोई व्यक्ति बिना ध्यान दिए ही जीवन के महत्वपूर्ण मील के पत्थरों को पार कर जाता है, और बिजली के चमकते ही वह स्वयं को अपने जीवन के ढलते हुए वर्षों में पाता है। समय के चिन्हों से उसके सारे शरीर पर मुहर लगाई गई है: वह अब आगे से सीधा खड़ा नहीं हो सकता है, घने काले बालों वाला सिर अब सफेद, एवं चमकदार हो गया है, चमकीली आंखें धुंधली हो गई हैं एवं अँधेरा छा गया है, चिकनी एवं कोमल त्वचा झुर्रीदार एवं दागदार हो गई है। उसकी सुनने की शक्ति कमज़ोर हो गई है, उसके दांत ढीले हो गए हैं एवं गिर गए हैं, उसकी प्रतिक्रियाएं धीमी हो गई हैं, उसकी गतिविधियां सुस्त हो गई हैं। इस मुकाम पर, उसने अपनी जवानी के जोशीले दिनों को पूरी तरह से अलविदा कह दिया है और अपने जीवन की सांझ की हलकी रौशनी में प्रवेश किया है: बुढ़ापा। इसके आगे, वह मृत्यु का सामना करेगा, किसी मानव के जीवन का अंतिम घटनाक्रम।

13 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग चार



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग चार

सन्तान: पाँचवां घटनाक्रम
विवाह करने के पश्चात्, कोई व्यक्ति अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करने में लग जाता है। कोई यह नहीं कह सकता कि उसके पास कितने एवं किस प्रकार के संतान होंगे; यह किसी की नियति द्वारा निर्धारित होता है, सृष्टिकर्ता द्वारा पूर्वनिर्धारित होता है। यह पाँचवां घटनाक्रम है जिससे होकर किसी व्यक्ति को गुज़रना होगा।
यदि किसी व्यक्ति ने किसी और बच्चे की भूमिका को पूरा करने के लिए जन्म लिया है, तो वह किसी और के माता पिता की भूमिका पूरा करने के लिए अगली पीढ़ी का पालन-पोषण करता है। भूमिकाओं का यह स्थानान्तरण किसी व्यक्ति को अलग अलग दृष्टिकोण से जीवन के अलग अलग पहलुओं का अनुभव कराता है। साथ ही यह किसी व्यक्ति को जीवन के अनुभवों के विभिन्न संग्रह प्रदान करता है, जिसमें वह सृष्टिकर्ता की उसी संप्रभुता को जान पाता है, साथ ही साथ उस तथ्य को जान पाता है कि कोई भी व्यक्ति सृष्टिकर्ता के पूर्वनिर्धारण का अतिक्रमण या उसे पलट नहीं सकता है।

11 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग तीन



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग तीन
परमेश्वर का अधिकार (II)    भाग तीन
स्वतन्त्रता: तीसरा घटनाक्रम
जब कोई व्यक्ति बचपन एवं किशोरावस्था से होकर गुज़र जाता है और आहिस्ता आहिस्ता एवं अनिवार्य रूप से परिपक्वता की ओर पहुँच जाता है, तो उनके लिए अगला कदम होता है कि वे अपनी किशोरावस्था को पूरी तरह से अलविदा कह दें, अपने अपने माता पिता को अलविदा कह दें, और एक स्वतन्त्र वयस्क के रूप में उस मार्ग का सामना करें जो सामने है। इस बिन्दु पर उन्हें सभी लोगों, घटनाओं, एवं चीज़ों का सामना करना होगा जिन्हें एक व्यस्क को सामना करना पड़ता है, और अपनी नियति की जंज़ीर की सभी कड़ियों का सामना करना होगा।यह तीसरा घटनाक्रम है जिससे होकर किसी व्यक्ति को गुज़रना होगा।

10 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग दो



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग दो
परमेश्वर का अधिकार (II)     भाग दो
एक मनुष्य के जीवन में छ: घटनाक्रम
अपने जीवन के पथक्रम में, हर एक व्यक्ति महत्वपूर्ण घटनाक्रमों की एक श्रृंखला पर पहुँचता है। ये अत्याधिक बुनियादी, और अति महत्वपूर्ण कदम हैं जो जीवन में किसी व्यक्ति की नियति को निर्धारित करते हैं। जो कुछ नीचे दिया गया है वह इन मील के पत्थरों का एक संक्षिप्त विवरण है जिनसे होकर हर एक स्त्री या पुरुष को अपने जीवन के पथक्रम में गुज़रना होगा।
जन्म: पहला घटनाक्रम
जहाँ किसी व्यक्ति का जन्म होता है, जिस परिवार में उस स्त्री या पुरुष का जन्म होता है, उसका लिंग, रंग-रूप, जन्म का समय: ये किसी व्यक्ति के जीवन के प्रथम घटनाक्रम के विवरण हैं।

9 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग एक



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III परमेश्वर का अधिकार (II) भाग एक
परमेश्वर का अधिकार (II)    भाग एक
आज हम "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है" के विषय पर अपनी सभा को जारी रखेंगे। हम पहले से ही इस विषय पर दो सभाएँ कर चुके हैं, पहला परमेश्वर के अधिकार से सम्बन्धित था, और दूसरा परमेश्वर के धर्मी स्वभाव से सम्बन्धित था। इन दोनों सभाओं को सुनने के पश्चात्, क्या तुम लोगों ने परमेश्वर की पहचान, हैसियत, और हस्ती की नई समझ हासिल की है? क्या इन अन्तः दृष्टियों ने परमेश्वर के अस्तित्व की सच्चाई के विषय में और अधिक ठोस ज्ञान और निश्चित्ता प्राप्त करने में तुम लोगों की सहायता की है? आज मैंने "परमेश्वर के अधिकार" के शीर्षक को विस्तार से बताने की योजना बनाई है।

1 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I परमेश्वर का अधिकार (I) भाग चार के क्रम में



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I परमेश्वर का अधिकार (I) भाग चार के क्रम मेंपरमेश्वर का अधिकार (I)    भाग चार के क्रम में


सभी चीज़ों व प्राणियों के ऊपर सृष्टिकर्ता के नियन्त्रण और प्रभुत्व की सच्चाई सृष्टिकर्ता के अधिकार के सच्चे अस्तित्व के विषय में बोलते हैं
उसी प्रकार से, अय्यूब के ऊपर यहोवा की आशीष अय्यूब की पुस्तक में दर्ज है। परमेश्वर ने अय्यूब को क्या दिया था? "और यहोवा ने अय्यूब के पिछले दिनों में उसको अगले दिनों से अधिक आशीष दी; और उसके चौदह हज़ार भेड़ बकरियाँ, छः हज़ार ऊँट, हज़ार जोड़ी बैल, और हज़ार गदहियाँ हो गईं" (अय्यूब 42:12)। मनुष्य के नज़रिए से, अय्यूब को दी गई ये चीज़ें क्या थीं? क्या वे मनुष्य की सम्पत्ति थी? इन सम्पत्तियों के द्वारा क्या अय्यूब उस युग में बहुत अधिक धनी हो गया था? उसे ऐसी सम्पत्तियाँ कैसे प्राप्त हुईं थीं? उसका धन कैसे बढ़ा था? यहाँ पर यह बात कही नहीं जा रही है कि परमेश्वर की आशीष के लिए धन्यवाद जिस से अय्यूब ने इन सम्पत्तियों को प्राप्त किया? अय्यूब इन सम्पत्तियों को किस नज़रिए से देखता था, और वह परमेश्वर की आशीषों को किस प्रकार महत्व देता था, ये वो बातें नहीं हैं जिन के भीतर हम जाएँगे। जब भी परमेश्वर की आशीषों की बात होती है, सभी लोग दिन और रात परमेश्वर से आशीषित होने की लालसा करते हैं, परन्तु मनुष्य के पास इसके ऊपर नियन्त्रण नहीं होता है कि वह अपने जीवनकाल के दौरान कितनी सम्पत्तियाँ प्राप्त कर सकता है, और यह कि वह परमेश्वर से आशीषों को प्राप्त करेगा भी कि नहीं - और यह एक निर्विवादित सत्य है!

31 मार्च 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I परमेश्वर का अधिकार (I) भाग चार


स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I परमेश्वर का अधिकार (I) भाग चारपरमेश्वर का अधिकार (I)    भाग चार


सृष्टिकर्ता के अधिकार को समय, स्थान, या भूगोल द्वारा विवश नहीं किया जा सकता है, और न ही उसके अधिकारों का मूल्यांकन किया जा सकता है
आओ हम उत्पत्ति 22:17-18 को देखें। यह यहोवा परमेश्वर के द्वारा बोला गया एक और अंश है, जिसमें उसने अब्राहम से कहा, "इस कारण मैं निश्चय तुझे आशीष दूँगा; और निश्चय तेरे वंश को आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर के बालू के समान अनगिनत करूँगा, और तेरा वंश अपने शत्रुओं के नगरों का अधिकारी होगा। और पृथ्वी की सारी जातियाँ अपने को तेरे वंश के कारण धन्य मानेंगीः क्योंकि तू ने मेरी बात मानी है।" यहोवा परमेश्वर ने अब्राहम को कई बार आशीष दी कि उसके वंश के लोग बहुगुणित होंगे - और किस सीमा तक बहुगुणित होंगे? उस सीमा तक जितना पवित्र शास्त्र में लिखा हैः "आकाश के तारागण, और समुद्र के तीर के बालू के समान।" कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर अब्राहम को आकाश के तारों के समान अनगिनित, और समुद्र के तीर के रेत के किनकों के समान ढेर सारा वंश देना चाहता था।

30 मार्च 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I परमेश्वर का अधिकार (I) भाग तीन



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I परमेश्वर का अधिकार (I) भाग तीन

परमेश्वर का अधिकार (I)     भाग तीन
2. परमेश्वर ने मनुष्य के साथ एक वाचा बाँधने के लिए अपने वचनों को उपयोग किया।
(उत्पत्ति 9:11-13) "और मैं तुम्हारे साथ अपनी यह वाचा बाँधता हूँ कि सब प्राणी फिर जलप्रलय से नाश न होंगेः और पृथ्वी के नाश करने के लिए फिर जलप्रलय न होगा।” फिर परमेश्वर ने कहा, “जो वाचा मैं तुम्हारे साथ, और जितने प्राणी तुम्हारे संग हैं उन सब के साथ भी युग युग की पीढ़ियों के लिए बाँधता हूँ, उसका यह चिन्ह हैः कि मैं ने बादल में अपना धनुष रखा है, वह मेरे और पृथ्वी के बीच में वाचा का चिन्ह होगा।"

29 मार्च 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I परमेश्वर का अधिकार (I) भाग दो के क्रम में



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I परमेश्वर का अधिकार (I) भाग दो के क्रम में

परमेश्वर का अधिकार (I)    भाग दो के क्रम में

छठवें दिन, सृष्टिकर्ता ने कहा, और हर प्रकार के जीवित प्राणी जो उसके मस्तिष्क में थे एक के बाद एक अपने आप को प्रगट करने लगे
स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर न होते हुए, सब वस्तुओं को बनाने के लिए सृष्टिकर्ता का कार्य लगातार पाँचवे दिन तक चलता रहा, उसके तुरन्त बाद सृष्टिकर्ता ने सब वस्तुओं की सृष्टि के छठवें दिन का स्वागत किया। यह दिन एक और नई शाम थी, तथा एक और असाधारण दिन था। तब, इस नए दिन की शाम के लिए सृष्टिकर्ता की क्या योजना थी? कौन से नए जीव जन्तुओं को उसने उत्पन्न, और पैदा करना चाहा? ध्यान से सुनो, यह सृष्टिकर्ता की आवाज़ है....।

28 मार्च 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I परमेश्वर का अधिकार (I) भाग दो



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I परमेश्वर का अधिकार (I) भाग दो

परमेश्वर का अधिकार (I)    भाग दो
चौथे दिन, जब परमेश्वर ने एक बार फिर से अपने अधिकार का उपयोग किया तो मानवजाति के लिए मौसम, दिन, और वर्ष अस्तित्व में आ गए
सृष्टिकर्ता ने अपनी योजना को पूरा करने के लिए अपने वचनों का इस्तेमाल किया, और इस तरह से उसने अपनी योजना के पहले तीन दिनों को गुज़ारा। इन तीन दिनों के दौरान, परमेश्वर इधर उधर के कामों में व्यस्त, या अपने प में थका हुआ दिखाई नहीं दिया; इसके विपरीत, उसने अपनी योजना के तीन बेहतरीन दिनों को गुज़ारा, और संसार के मूल रूपान्तरण के महान कार्य को पूरा किया। एक बिलकुल नया संसार उसकी आँखों में दृष्टिगोचर हुआ, और अंश अंश कर के वह ख़ूबसूरत तस्वीर जो उसके विचारों में मुहरबन्द थी अंततः परमेश्वर के वचनों में प्रगट हो गई। हर चीज़ का प्रकटीकरण एक नए जन्मे हुए बच्चे के समान था, और सृष्टिकर्ता उस तस्वीर से आनंदित हुआ जो एक समय उसके विचारों में था, परन्तु जिसे अब जीवन्त कर दिया गया था। उसी समय, उसके हृदय ने चाँन्दी की सी संतुष्टि प्राप्त की, परन्तु उसकी योजना बस अभी शुरू ही हुई थी। आँखों के पलक झपकते ही, एक नया दिन आ गया था - और सृष्टिकर्ता की योजना में अगला पृष्ठ क्या था? उसने क्या कहा था? और उसने अपने अधिकार का इस्तेमाल कैसे किया था? और, उसी समय, इस नए संसार में कौन सी नई चीज़ें आ गईं? सृष्टिकर्ता के मार्गदर्शन का अनुसरण करते हुए, हमारी निगाहें चौथे दिन पर आ टिकीं जिसमें परमेश्वर ने सभी चीज़ों की सृष्टि की थी, एक ऐसा दिन जिसमें एक और नई शुरूआत होने वाली थी। वास्तव में, यह सृष्टिकर्ता के लिए निःसन्देह एक और बेहतरीन दिन था, और आज की मानवजाति के लिए यह एक और अति महत्वपूर्ण दिन था। यह, वास्तव में, एक बहुमूल्य दिन था। वह इतना बेहतरीन क्यों था, वह इतना महत्वपूर्ण क्यों था, और वह इतना बहुमूल्य कैसे था? आओ सबसे पहले सृष्टिकर्ता के द्वारा बोले गए वचनों को सुनें.....।

1. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना क्या है? अगर कोई केवल प्रभु के लिए मिशनरी (धर्म-प्रचार सम्बन्धी) काम करता है, तो क्या यह परमेश्वर की इच्छा का पालन करना है?

XVIII. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण क्या है और परमेश्वर में विश्वास की सच्ची गवाही क्या है, इस पर हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाह...