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25 मई 2019

दुनिया के अंधकार और बुराई के स्रोत के बारे में एक संक्षिप्त वार्ता

यांग ली वुहाई शहर, इनर मंगोलिया स्वायत्त क्षेत्र
जब मैं स्कूल में ही थी, तब मेरे पिता बीमार हो गए और उनका देहांत हो गया। उनकी मृत्यु के बाद, परिवार के दोनों पक्षों के चाचाओं/मामाओं ने, जिनकी मेरे पिता द्वारा अक्सर ही मदद की जाती थी, न केवल हमारा—मेरी माँ जिनके पास कमाई का कोई स्रोत नहीं था, मेरी दो बहनों और मुझ पर—कोई ध्यान नहीं दिया, बल्कि, इसके विपरीत, हमसे फायदा उठाने के लिए वे जो कुछ भी कर सकते थे, उन्होंने किया, यहाँ तक कि उस थोड़ी सी विरासत के लिए भी हमसे लड़ाई करते थे जो मेरे पिता पीछे छोड़ गए थे। मेरे रिश्तेदारों की बेरुख़ी और उन्होंने जो कुछ भी किया जिसकी मैं कभी उम्मीद भी नहीं कर सकती थी, उसके सामने मुझे बहुत पीड़ा महसूस होती थी और मैं इन रिश्तेदारों द्वारा प्रदर्शित विवेक के पूर्ण अभाव और निष्ठुरता से नफ़रत करने के अलावा और कुछ नहीं कर सकती थी, साथ ही मुझे मानव प्रकृति की अस्थिरता का भी ज्ञान हो रहा था। इसके बाद, जब भी मैं समाज में पारिवारिक सदस्यों के धन के पीछे एक-दूसरे से लड़ने, या धन के लिए लोगों के चोरी या हत्या करने की घटनाओं को देखती, तो मैं अक्सर विलाप किया करती थी कि आजकल दुनिया अत्यधिक अंधकार से भर गई है, कि लोगों के दिल वाकई बेईमान हो गए हैं और यह दुनिया वाकई बहुत अस्थिर है।

24 मई 2019

मेरे जीवन सिद्धांतों ने मेरा अहित किया

चैंगकाई बेंग्ज़ी शहर, लियाओनिंग प्रांत
एक सामान्य वाक्यांश "अच्छे लोग सबसे पीछे रह जाते हैं", ऐसी बात है जिससे मैं निजी रूप से बेहद परिचित हूँ। मैं और मेरा पति विशेष रूप से निष्कपट लोग थे: जब ऐसे मामलों की बात आती जिनमें हमारा खुद का निजी लाभ या हानि शामल हो, तो हम दूसरों के साथ बखेड़ा या झंझट वाले लोगों में से नहीं थे। हम जहाँ धीरज रख सकते थे हम धीरज रखते थे, हम जहाँ समझौतापरक हो सकते थे, वहाँ हम समझौतापरक होने की पूरी कोशिश करते थे। परिणामस्वरूप, अक्सर ही हम अपने को दूसरों के द्वारा धोखा दिया जाता हुआ और हमें अपमानित किया जाता हुआ पाते थे। वाकई ऐसा लगता था कि जीवन में, "अच्छे लोग सबसे पीछे रह जाते हैं"—अगर तुम्हारे दिल में बहुत ज्यादा अच्छाई हो, अगर तुम अपने मामलों में बहुत समझौतापरक और शालीन हो, तो तुम छले जाने के लिए काफी ज़िम्मेदार हो। मन में इन विचारों के साथ, मैंने खुद को इन सभी शोषणों के अधीन न होने और निराशा में और न जीने का संकल्प लिया: भविष्य के मामलों में और दूसरों के साथ व्यवहार में, मैं बहुत समझौतापरक न होने का संकल्प लेती हूँ। यहाँ तक कि मेरे सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लेने के बाद भी, मैं अभी भी अपने आचरण और दूसरों के साथ अपनी बातचीत में इस सिद्धांत को लागू करती थी।

23 मई 2019

तथाकथित अच्‍छे व्‍यक्ति का असली चेहरा

केमु, झ़ुमैडियन शहर, हेनन प्रांत
अपने मन में, मैं हमेशा स्वयं को एक अच्‍छी मानवता वाली व्‍यक्ति समझती थी। मुझे ऐसा इसलिए लगता था क्योंकि, मेरे पड़ोसी अक्सर मेरे माता-पिता के सामने मेरी समझदार और अपने परिवार की चिंता करने वाली होने के लिए तारीफ करते थे; कहते थे कि मैं अपने माता-पिता की आँखों का तारा हूँ। विवाह के बाद, मेरे ससुराल के लोग पड़ोसियों के सामने मेरे दयालु और संतानोचित होने के लिए प्रशंसा करते थे। मेरी इकाई में, मेरा अगुआ मेरे ईमानदार और सक्षम होने की वजह से मेरी सराहना करता था। और परमेश्वर के कार्य के इस चरण को स्‍वीकार करने के बाद से, मैं कलीसिया द्वारा मुझसे कही गई हर चीज़ को करने के लिए के प्रति आज्ञाकारी रही हूँ। अपने अगुआ द्वारा अच्‍छा काम न करने पर डाँटे जाने पर भी मैं उसका कभी भी विरोध नहीं करती थी और मैं प्रायः ज़रूरतमंद भाई-बहनों की मदद करती थी। वैसे तो, मैं अपने आप को समझदार, कृपालु और मानवता-युक्‍त सहृदय व्‍यक्ति समझती हूँ।

22 मई 2019

भाग्य से जूझने के उन दिनों को विदाई

सत्यइशिन
एक पिछड़ा हुआ देहाती गाँव, अपने काम से थके हुए मेरे माता-पिता, वित्तीय कठिनाइयों का एक जीवन... मेरे युवा दिमाग पर इन उदास यादों की छाप पड़ी हुई थी, "भाग्य" के बारे में यह मेरी पहली धारणा थी। स्कूल जाना शुरू करने के बाद, जब मैंने पहली बार मेरे शिक्षक को यह कहते हुए सुना कि "तुम अपने भाग्य को अपने ही हाथों से नियंत्रित करते हो", तो मैंने इन शब्दों को दृढ़ता से मेरे मानस में रख लिया। मेरा मानना था कि हालांकि मैं इस तथ्य को नहीं बदल सकती थी कि मैं गरीबी में पैदा हुई थी, फिर भी कड़ी मेहनत के द्वारा मैं अपने भाग्य को बदल सकती थी। परिणामस्वरूप, अपने "भाग्य" के साथ कुश्ती करने के लिए और स्वर्ग का एक ऐसा टुकड़ा हासिल करने के लिए जिसे मैं अपना कह सकूँ, मैंने अपना पूरा ज़ोर लगा दिया।

1. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना क्या है? अगर कोई केवल प्रभु के लिए मिशनरी (धर्म-प्रचार सम्बन्धी) काम करता है, तो क्या यह परमेश्वर की इच्छा का पालन करना है?

XVIII. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण क्या है और परमेश्वर में विश्वास की सच्ची गवाही क्या है, इस पर हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाह...