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22 अग॰ 2019

3. एक मात्र सच्चे परमेश्वर को "त्रिदेव या त्रिविध परमेश्वर" के रूप में वर्णित करना, परमेश्वर की अवहेलना और निंदा करना है।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया-परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव, परमेश्वर की गवाही देते बीस सत्य

3. एक मात्र सच्चे परमेश्वर को "त्रिदेव या त्रिविध परमेश्वर" के रूप में वर्णित करना, परमेश्वर की अवहेलना और निंदा करना है।
परमेश्वर के प्रासंगिक वचन:
मैं बताता हूँ कि वास्तव में, ब्रह्माण्ड में कहीं भी त्रित्व का अस्तित्व नहीं है। परमेश्वर के न पिता हैं और न पुत्र, पिता और पुत्र के द्वारा संयुक्त तौर पर उपयोग किया जाने वाले एक साधन: पवित्र-आत्मा, की परिकल्पना तो बिल्कुल नहीं है। यह सब बड़ा भ्रम है और संसार में इसका कोई अस्तित्व नहीं है! परन्तु इस प्रकार के भ्रम का अपना मूल है और यह पूरी तरह से बिना आधार के नहीं है, क्योंकि तुम लोगों की बुद्धि बहुत ही साधारण नहीं है और विचार बिना तर्क के नहीं हैं। बल्कि, वे काफी उपयुक्त और प्रवीण हैं, इतने कि किसी शैतान के द्वारा भी अभेद्य हैं। अफसोस यह है कि ये विचार बिल्कुल भ्रामक हैं और इनका अस्तित्व नहीं है! तुम लोगों ने वास्तविक सत्य को देखा ही नहीं है; तुम लोग केवल अनुमान और धारणाएं बना रहे हो, फिर धोखेबाज़ी से दूसरों का विश्वास प्राप्त करने या बुद्धिहीन या तर्कहीन लोगों पर प्रभुत्व प्राप्त करने के लिए इन सब को कहानी में पिरो रहे हो, ताकि वे तुम्हारी महान और प्रसिद्ध "विशेषज्ञ शिक्षाओं" पर विश्वास करें। क्या यह सच है? क्या जीवन का यह तरीका है जो मनुष्य को प्राप्त करना चाहिए?

10 अग॰ 2019

1. प्रभु यीशु ने फरीसियों को क्यों शाप दिया था? वास्तव में फरीसियों का सार क्या है?

XV फरीसियों और परमेश्वर का विरोध करती धार्मिक दुनिया के सार को किस तरह पहचानें इस पर हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाहिए

सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया-परमेश्वर का स्वभाव, परमेश्वर की गवाही देते बीस सत्य, परमेश्वर को जानना
1. प्रभु यीशु ने फरीसियों को क्यों शाप दिया था? वास्तव में फरीसियों का सार क्या है?
संदर्भ के लिए बाइबल के पद:
"तुम भी अपनी परम्पराओं के कारण क्यों परमेश्‍वर की आज्ञा टालते हो? क्योंकि परमेश्‍वर ने कहा है, 'अपने पिता और अपनी माता का आदर करना', और 'जो कोई पिता या माता को बुरा कहे, वह मार डाला जाए।' पर तुम कहते हो कि यदि कोई अपने पिता या माता से कहे, 'जो कुछ तुझे मुझ से लाभ पहुँच सकता था, वह परमेश्‍वर को भेंट चढ़ाया जा चुका', तो वह अपने पिता का आदर न करे, इस प्रकार तुम ने अपनी परम्परा के कारण परमेश्‍वर का वचन टाल दिया। हे कपटियो, यशायाह ने तुम्हारे विषय में यह भविष्यद्वाणी ठीक ही की है: 'ये लोग होठों से तो मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझ से दूर रहता है। और ये व्यर्थ मेरी उपासना करते हैं, क्योंकि मनुष्यों की विधियों को धर्मोपदेश करके सिखाते हैं'" (मत्ती 15:3-9)।
"हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उस में प्रवेश करनेवालों को प्रवेश करने देते हो। हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा।
हे कपटी शास्त्रियो और फरीसियो, तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिये सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

1 जून 2019

आपदाओं के बीच मैंने परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव देखा

ली जिंग, बीजिंग
7 अगस्त, 2017
उस दिन, सुबह से बारिश होना शुरू हो गई थी। मैं एक भाई के घर में सभा में गई थी, इसी दौरान बारिश अधिक से अधिक तेज होती जा रही थी। दोपहर तक यह ऐसे बरसने लगी जैसे सीधे स्वर्ग से ही गिर रही हो। हमारी सभा के खत्म होने के समय तक, बारिश का पानी मेरे भाई के बरामदे में घुस गया था, लेकिन चूंकि मैं अपने परिवार के लिए चिंतित थी, इसलिए मैं अपने घर की ओर जाने के लिए संघर्ष करने लगी। आधे रास्ते तक पहुंचने पर, कुछ लोग खतरे से निकलकर भागते हुए मेरे पास आए और कहा, "क्या तुम भाग नहीं रही हो, क्या तुम अब भी घर जा रही हो?" जब मैं घर पहुंची, तो मेरे बच्चे ने मुझसे कहा, "क्या बाढ़ आपको बहा नहीं ले गई?" तब ही मुझे पता चला कि मेरे दिल में परमेश्वर नहीं था। तभी, मेरी पड़ोसी बहन के पति छत पर चढ़ गए और देखा कि हमारे घर से कुछ ही दूर के कई घर पानी में बह गए थे। जलप्रवाह और भी तीव्र होता जा रहा था, और बहन के पति ने जोर दिया कि वे अपने बच्चे को पहाड़ पर ले जाएँ, लेकिन वह नहीं गई। हम कुछ बहनों ने आपस में यह चर्चा की, कि उस बहन का पति इस प्रकार से बहस कर रहा है जैसे इसमें परमेश्वर की इच्छा शामिल हो; तब ही हम रात गुजारने के लिए पहाड़ के ऊपर स्थित एक आश्रय घर में उसके साथ चले गए। वहां, हमने उन लोगों की बातें सुनी जो उस आपदा से बचकर आए थे कि उस बाढ़ का पानी कितना भयंकर था, और कैसे लोग सभी दिशाओं की ओर चले गए; कुछ लोग छत पर चढ़ गए, कुछ बह गए, कुछ को पेड़ों ने रोक लिया...

8 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग पांच



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग पांच

परमेश्वर का धर्मी स्वभाव     भाग पांच
     (III) पांच प्रकार के लोग
फिलहाल के लिए, मैं परमेश्वर के धर्मी स्वभाव के विषय में हमारी सभा को यहीं छोडूंगा। आगे मैं परमेश्वर के अनुयायियों को अनेक श्रेणियों में वर्गीकृत करूंगा, परमेश्वर के विषय में उनकी समझ और उसके धर्मी स्वभाव के साथ उनकी समझ और अनुभव के अनुसार, ताकि तुम सब उस अवस्था को जिससे तुम सब वर्तमान में सम्बन्धित हो साथ ही साथ अपने वर्तमान डीलडौल को जान सको। परमेश्वर के विषय में उनके ज्ञान और उसके धर्मी स्वभाव के विषय में उनकी समझ के सम्बन्ध में, वे अलग अलग अवस्थाएं एवं डीलडौल जिन्हें लोग धारण करते हैं उन्हें साधारण तौर पर पांच प्रकारों में बांटा जा सकता है। इस विषय को अद्वितीय परमेश्वर और उसके धर्मी स्वभाव को जानने के आधार पर आधारित किया गया है; इसलिए, जैसे तुम सब निम्लिखित विषयवस्तु को पढ़ते हो, तो तुम्हें सावधानीपूर्वक यह मालूम करने की कोशिश करनी चाहिए कि तुम सब के पास परमेश्वर की अद्वितीयता और उसके धर्मी स्वभाव के सम्बन्ध में वास्तव में कितनी समझ और कितना ज्ञान है, और तब तुम सब यह अनुमान लगाने के लिए इसका उपयोग कर सकते हो कि तुम सब सचमुच में किस अवस्था से सम्बन्धित हो, तुम लोगों का डीलडौल सचमुच में कितना बड़ा है, और तुम सब सचमुच में किस प्रकार के व्यक्ति हो।

7 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग चार



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग चार 

परमेश्वर का धर्मी स्वभाव     भाग चार
नीनवे के लोगों के हृदयों में सच्चे पश्चाताप से उन्होंने परमेश्वर की दया को प्राप्त किया और उस ने उनके अंत को बदल दिया
क्या वहां परमेश्वर के हृदय के बदलाव और उसके क्रोध के बीच कोई परस्पर विरोध था? नहीं, बिलकुल भी नहीं! यह इसलिए है क्योंकि उस विशेष समय पर परमेश्वर की सहनशीलता का अपना कारण था। इसका कारण क्या हो सकता है? यह वह है जिसे बाईबिल में दिया गया है: "प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने कुमार्ग से फिर गया," और अपने हाथों के उपद्रवी कार्यों को तज दिया।
यह "कुमार्ग" कुछ मुटठीभर बुरे कार्यों की और संकेत नहीं करता है, परन्तु लोगों के व्यवहार के पीछे पाए जाने वाले बुरे स्रोत की और संकेत करता है। "अपने कुमार्ग से फिर जाना" इसका अर्थ है कि जिन पर सन्देह है वे कभी भी इन कार्यों को दोबारा नहीं करेंगे। दूसरे शब्दों में, वे पुन: इस बुरे तरीके से व्यवहार नहीं करेंगे;

6 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग तीन



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग तीन

परमेश्वर का धर्मी स्वभाव     भाग तीन

(II) सच्चे पश्चाताप के जरिए मानवता परमेश्वर की करुणा और सहनशीलता को प्राप्त करती है।
जो आगे दिया गया है वह "परमेश्वर द्वारा नीनवे का उद्धार" की बाइबल की कहानी है।
(योना 1:1-2) यहोवा का यह वचन अमित्तै के पुत्र योना के पास पहुंचा। "उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और उसके विरुद्ध प्रचार कर क्योंकि उसकी बुराई मेरी दृष्टि में बढ़ गई है।"
(योना 3) "तब यहोवा का यह वचन दूसरी बार योना के पास पहुंचा। "उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और जो बात मैं तुझ से कहूँगा उसका उस में प्रचार कर।" तब योना यहोवा के वचन के अनुसार नीनवे को गया। नीनवे एक बहुत बड़ा नगर था, वह तीन दिन की यात्रा का था। योना ने नगर में प्रवेश करके एक दिन की यात्रा पूरी की और यह प्रचार करता गया, "अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा।" तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्वर के वचन की प्रतीति की, और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभी ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुंचा, और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया। राजा ने प्रधानों से सम्मति लेकर नीनवे में इस आज्ञा का ढिंढोरा पिटवायाः राजा और उसके सरदारों के आदेश से, कहते हुए, "क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाने पाए, वे न खाएं और न पानी पिएं।" मनुष्य और पशु दोनों टाट ओढ़ें और वे परमेश्वर की दोहाई चिल्ला-चिल्ला कर दें, और अपने कुमार्ग से फिरें, और उस उपद्रव से, जो वे करते है, पश्चाताप करें। संभव है, परमेश्वर दया करे और अपनी इच्छा बदल ले और उसका भड़का हुआ कोप शांत हो जाए और हम नष्ट होने से बच जाएँ। जब परमेश्वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया।"

5 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग दो



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग दो
परमेश्वर का धर्मी स्वभाव     भाग दो
हालाँकि परमेश्वर का क्रोध मनुष्य से छिपा हुआ और अज्ञात है, फिर भी यह किसी अपराध को नहीं सहता है
समस्त मूर्ख और अबोध मानवता के प्रति परमेश्वर का उपचार मुख्य रूप से दया और सहनशीलता पर आधारित है। दूसरी ओर, उसका क्रोध समय और चीज़ों के अति विशाल पैमाने में छिपा हुआ है; मनुष्य इससे अनजान है। परिणामस्वरूप, यह मनुष्य के लिए कठिन है कि वह परमेश्वर को उसका क्रोध प्रदर्शित करते हुए देखे, और साथ ही उसके क्रोध को समझना भी कठिन है। जैसा कहा जा चुका है, मनुष्य परमेश्वर के क्रोध को हल्के में लेता है। जब मनुष्य परमेश्वर के अंतिम कार्य और सहनशीलता के कदम और मनुष्य की क्षमा का सामना करता है - अर्थात्, जब परमेश्वर की दया का अंतिम उदाहरण और उसकी अंतिम चेतावनी उनके पास पहुँचती है - यदि वे तब भी परमेश्वर का विरोध करने के लिए उन्हीं तरीकों का इस्तेमाल करते हैं और पश्चाताप करने, अपने मार्गों को सुधारने या उसकी दया को स्वीकार करने का कोई प्रयास नहीं करते हैं, तो परमेश्वर आगे से उनको अपनी सहनशीलता और धैर्य प्रदान नहीं करेगा। इसके विपरीत, यह वह समय है जब परमेश्वर अपनी दया को वापस ले लेगा। इसके पश्चात्, वह बस अपने क्रोध को प्रकट करेगा। वह अलग अलग तरीकों से अपने क्रोध को प्रकट कर सकता है, बिलकुल वैसे ही जैसे वह लोगों को दण्ड देने और नष्ट करने के लिए अलग अलग पद्धतियों का इस्तेमाल करता है।

4 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग एक



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग एक

परमेश्वर का धर्मी स्वभाव     भाग एक


तुम सब परमेश्वर के अधिकार के बारे में पिछली सभा में सुन चुके हो, अब मैं आश्वस्त हूं कि तुम सब उस मुद्दे पर शब्दों की व्यूह रचना के साथ पूर्ण रूप से सुसज्जित हो गए हो। तुम सब कितना अधिक स्वीकार कर सकते हो, आभास कर सकते और समझ सकते हो यह इस पर निर्भर करता है कि तुम सब उसके लिए कितना प्रयास करोगे। यह मेरी आशा है कि तुम सब इस मुद्दे तक बड़े उत्साह से पहुंच सको; तुम लोगों को किसी भी कीमत पर इसके साथ अधूरे मन से व्यवहार नहीं करना चाहिए। अब, क्या परमेश्वर के अधिकार को जानना परमेश्वर की सम्पूर्णता को जानने के समान है? कोई कह सकता है कि परमेश्वर के अधिकार को जानना स्वयं अद्वितीय परमेश्वर को जानने की शुरुआत है, और कोई यह भी कह सकता है कि परमेश्वर के अधिकार को जानने का अर्थ है कि किसी ने स्वयं अद्वितीय परमेश्वर की हस्ती को जानने हेतु पहले से ही द्वार के भीतर कदम रख दिया है। यह समझ परमेश्वर को जानने का एक भाग है। दूसरा भाग क्या है? यह वह विषय है जिसके बारे मैं आज विचार विमर्श करना चाहूंगा - परमेश्वर का धर्मी स्वभाव।

3 मार्च 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग आठ


13. अपने पुनरूत्थान के बाद यीशु रोटी खाता है और पवित्र शास्त्र को समझाता है
(लूका 24:30-32) जब वह उनके साथ भोजन करने बैठा, तो उसने रोटी लेकर धन्यवाद किया और उसे तोड़कर उनको देने लगा। तब उनकी आँखें खुल गईं; और उन्होंने उसे पहचान लिया, और वह उनकी आँखों से ओझल हो गया। उन्होंने आपस में कहा, "जब वह मार्ग में हमसे बातें करता था और पवित्रशास्त्र का अर्थ हमें समझाता था, तो क्या हमारे मन में उत्तेजना न उत्पन्न हई?"
14. चेलों ने यीशु को खाने के लिए भूनी हुई मछली दी
(लूका 24:36-43) वे ये बातें कह ही रहे थे कि वह आप ही उनके बीच में आ खड़ा हुआ, और उनसे कहा, "तुम्हें शांति मिले।" परन्तु वे घबरा गए, और डर गए, और समझे कि हम किसी आत्मा को देख रहे हैं। उसने उनसे कहा, "क्यों घबराते हो? और तुम्हारे मन में क्यों सन्देह उठते हैं? मेरे हाथ और मेरे पाँव को देखो कि मैं वही हूँ। मुझे छूकर देखो, क्योंकि आत्मा के हड्डी माँस नहीं होता जैसा मुझ में देखते हो।" यह कहकर उसने उन्हें अपने हाथ पाँव दिखाए। जब आनन्द के मारे उनको प्रतीति न हुई, और वे आश्चर्य करते थे, तो उसने उनसे पूछा, "क्या यहाँ तुम्हारे पास कुछ भोजन है?" उन्होंने उसे भुनी हुई मछली का टुकड़ा दिया और एक शहद का छत्ता दिया। उसे लेकर उनके सामने खाया।

2 मार्च 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग सात


अब आओ हम नीचे दिए पवित्र शास्त्र के अंश को पढ़ें
12. अपने पुनरूत्थान के बाद अपने चेलों के लिए यीशु के वचन
(यूहन्ना 20: 26-29) आठ दिन के बाद उसके चेले फिर घर के भीतर थे, और थोमा उनके साथ था; और द्वार बंद थे, तब यीशु आया और उनके बीच में खड़े होकर कहा, "तुम्हें शान्ति मिले।" तब उसने थोमा से कहा, "अपनी उँगली यहाँ लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल, और अविश्वासी नहीं परंतु विश्वासी हो।" यह सुन थोमा ने उत्तर दिया, "हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्वर! यीशु ने उससे कहा, तू ने मुझे देखा है, क्या इसलिए विश्वास किया है, धन्य वे हैं जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया।"

1 मार्च 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग छे:


10. फरीसियों के द्वारा यीशु पर दोष लगाया जाना
(मरकुस 3:21-22) जब उसके कुटुम्बियों ने यह सुना, तो उसे पकड़ने के लिए निकले; क्योंकि वे कहते थे कि उसका चित ठिकाने नहीं है। शास्त्री भी जो यरूशलेम से आए थे, यह कहते थे, कि "उसमें शैतान है," और "वह दुष्टात्माओं के सरदार की सहायता से दुष्टात्माओं को निकालता है।"
11. यीशु फरीसियों को डाँटता है
(मत्ती12:31-32) इसलिये मैं तुम से कहता हूँ कि मनुष्य का सब प्रकार का पाप और निंदा क्षमा की जाएगी, पर पवित्र आत्मा की निंदा क्षमा न की जाएगी। जो कोई मनुष्य के पुत्र के विरोध में कोई बात कहेगा, उसका यह अपराध क्षमा किया जाएगा, परन्तु जो कोई पवित्र आत्मा के विरोध में कुछ कहेगा, उसका अपराध न तो इस लोक में और न परलोक में क्षमा किया जाएगा।
(मत्ती23:13-15) हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों, तुम पर हाय! तुम मनुष्यों के लिए स्वर्ग के राज्य का द्वार बन्द करते हो, न तो तुम स्वयं ही उसमें प्रवेश करते हो और न उसमें प्रवेश करने वालों को प्रवेश करने देते हो। हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम विधवाओं के घरों को खा जाते हो, और दिखाने के लिए बड़ी देर तक प्रार्थना करते रहते हो: इसलिये तुम्हें अधिक दण्ड मिलेगा। हे कपटी शास्त्रियों और फरीसियों तुम पर हाय! तुम एक जन को अपने मत में लाने के लिए सारे जल और थल में फिरते हो, और जब वह मत में आ जाता है तो उसे अपने से दूना नारकीय बना देते हो।

28 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग पांच


आगे, आओ हम पवित्र शास्त्र के निम्नलिखित अंश को देखें।
9.यीशु अद्भुत काम करता है।
1) यीशु पाँच हज़ार को भोजन कराता है
(यूहन्ना 6:8-13) उसके चेलों में से शमौन पतरस के भाई अन्द्रियास ने उससे कहा, "यहाँ एक लड़का है जिसके पास जौ की पाँच रोटी और दो छोटी मछलियाँ हैं; परन्तु इतने लोगों के लिए वे क्या हैं?" यीशु ने कहा, "लोगों को बैठा दो।" उस जगह बहुत घास थी। तब लोग जिनकी संख्या लगभग पाँच हज़ार की थी, बैठ गए। तब यीशु ने रोटियाँ लीं, और धन्यवाद करके बैठने वालों को बाँट दीं; और वैसे ही मछलियों में से जितनी वे चाहते थे बाँट दिया। जब वे खाकर तृप्त हो गए तो उसने अपने चेलों से कहा, "बचे हुए टुकड़े बटोर लो कि कुछ फेंका ना जाए।" अत: उन्होंने बटोरा, और जौ की पाँच रोटियों के टुकड़ों से जो खाने वालों से बच रहे थे, बारह टोकरियाँ भरीं।

27 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग चार


आगे, आओ इन निम्नलिखित अंशों को पढ़ें।
6. पहाड़ी उपदेश
1) धन्य वचन (मत्ती 5:3-12)
2) नमक और ज्योति (मत्ती 5:13-16)
3) व्यवस्था (मत्ती 5:17-20)
4) क्रोध (मत्ती 5:21-26)
5) व्यभिचार (मत्ती 5:27-30)
6) तलाक (मत्ती 5:31-32)
7) मन्नतें (मत्ती 5:33-37)
8) आँख के बदले आँख (मत्ती 5:38-42)
9) अपने शत्रुओं से प्रेम करो (मत्ती 5:43-48)
10) देने के विषय निर्देश (मत्ती 6:1-4)
11) प्रार्थना (मत्ती 6:5-8)
7. प्रभु यीशु के दृष्टान्त
1) बीज बोनेवाले का दृष्टान्त (मत्ती 13:1-9)
2) जंगली पौधों का दृष्टान्त (मत्ती 13:24-30)
3) राई के दाने का दृष्टान्त (मत्ती 13:31-32)
4) खमीर का दृष्टान्त (मत्ती 13:33)
5) जंगली बीजों के दृष्टान्त की व्याख्या (मत्ती 13:36-43)
6) अनमोल धन का दृष्टान्त (मत्ती13:44)
7) अनमोल मोती का दृष्टान्त (मत्ती13:45-46)
8) जाल का दृष्टान्त (मत्ती 13:47-50)
8. आज्ञाएँ

26 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग तीन


3. खोई हुई भेड़ का दृष्टान्त
(मत्ती18:12-14) क्या तुम समझते हो? यदि किसी मनुष्य की सौ भेड़ें हों, और उनमें से एक भटक जाए, तो क्या वह निन्यानवे को छोड़कर, और पहाड़ों पर जाकर, उस भटकी हुई को ना ढूँढ़ेगा? और यदि ऐसा हो कि उसे पाए, तो मैं तुम से सच कहता हूँ, कि वह उन निन्यानवे भेडों के लिए जो भटकी नहीं थी, इतना आनन्द नहीं करेगा जितना कि इस भेड़ के लिए करेगा। ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्ट हो।

25 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग दो के क्रम में


आगे, आओ हम पवित्र शास्त्र के इस अंश के इस अन्तिम वाक्य पर एक नज़र डालें: "मनुष्य का पुत्र तो सब्त के दिन का भी प्रभु है।" क्या इस वाक्य का एक व्यावहारिक पहलू है? क्या तुम लोग इसके व्यावहारिक पहलू को देख सकते हो? हर एक बात जो परमेश्वर कहता है उसके हृदय से आती है, तो उसने ऐसा क्यों कहा? तुम लोग इसे कैसे समझते हो? तुम लोग शायद इस वाक्य का अर्थ अब समझते हो, परन्तु उस समय बहुत से लोग नही समझते थे क्योंकि मनुष्यजाति बस उसी समय व्यवस्था के युग से बाहर निकली थी। उनके लिए, सब्त से बाहर निकलना एक कठिन बात थी, और सच्चे सब्त को समझने का तो जिक्र भी नहीं कर सकते थे।

24 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग दो


हमने बस अभी अभी उस समस्त कार्य के बारे में बात की है जिसे परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया गया था, ऐसी चीज़ों का क्रम जिसे उसने पहली बार किया था। इन चीज़ों में से प्रत्येक परमेश्वर के प्रबन्धकीय योजना, और परमेश्वर की इच्छा से सम्बन्धित है। वे स्वयं परमेश्वर के स्वभाव और उसके सार से सम्बन्धित हैं। यदि हम और अच्छे से जो परमेश्वर के पास है तथा जो परमेश्वर है उसे समझना चाहते हैं, तो हम पुराने नियम या व्यवस्था के युग तक नहीं रूकेंगे, किन्तु हमें उन कदमों के साथ आगे बढ़ने की आवश्यकता है जिन्हें परमेश्वर ने अपने कार्य के दौरान उठाया था। इस प्रकार, जब परमेश्वर ने व्यवस्था के युग का अन्त किया और अनुग्रह के युग का शुभारम्भ किया है, तो हमारे स्वयं के कदम अनुग्रह के युग में पधार चुके हैं—एक ऐसा युग जो अनुग्रह और छुटकारे से भरपूर है।

23 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग एक


इन अनेक सभाओं ने प्रत्येक व्यक्ति पर एक बड़ा प्रभाव डाला है। अब तक तो, लोग वास्तव में परमेश्वर के सच्चे अस्तित्व का एहसास कर पाये होंगे और यह कि परमेश्वर वास्तव में उन के अति निकट है। यद्यपि लोगों ने बहुत सालों से परमेश्वर पर विश्वास किया है, फिर भी उन्होंने उसके विचारों और युक्तियों को सचमुच में कभी भी वैसा नहीं समझा है जैसा वे अब समझते हैं, और ना ही उन्होंने उसके व्यावहारिक कार्यों को सचमुच में वैसा अनुभव किया है जैसा वे अब करते हैं। चाहे उस का ज्ञान हो या वास्तविक अभ्यास, अधिकतर लोगों ने कुछ नया सीखा है और एक ऊँची समझ को प्राप्त किया है, और भूतकाल में जो कुछ वे स्वयं कर रहे थे उसमें हुई ग़लती को महसूस किया है, अपने अनुभव के छिछलेपन का एहसास किया है और यह कि किसी चीज़ की अधिकता परमेश्वर के इच्छानुसार नहीं होता है, और यह महसूस किया कि जिस बात की मनुष्य में सब से ज़्यादा कमी है वह है परमेश्वर के स्वभाव का ज्ञान।

22 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II भाग सात के क्रम में


हालाँकि उस समय उसकी आशीषें केवल भेड़-बकरियों, गाय-बैलों, ऊंटों, भौतिक सम्पत्तियों, इत्यादि तक ही सीमित थीं, फिर भी वे आशीषें जिन्हें परमेश्वर अपने हृदय में अय्यूब को प्रदान करना चाहता था वे इनसे कहीं बढ़कर थीं। उस समय क्या इस बात को दर्ज किया गया था कि परमेश्वर किस प्रकार की अनन्त प्रतिज्ञाएं अय्यूब को देना चाहता था? अय्यूब के विषय में परमेश्वर कि आशीषों में, परमेश्वर ने उसकी आशीषों का जिक्र नहीं किया या उसे स्पर्श नहीं किया, और इसके बावजूद कि अय्यूब परमेश्वर के हृदय में क्या महत्व एवं स्थान रखता था, कुल मिलाकर परमेश्वर अपनी आशीषों के विषय में विवेकशील था। परमेश्वर ने अय्यूब के अंत की घोषणा नहीं की। इसका क्या अर्थ है? उस समय, जब परमेश्वर की योजना मनुष्य के अंत की घोषणा के बिन्दु तक नहीं पहुंची थी, और उस योजना ने उसके कार्य के अंतिम चरण में प्रवेश नहीं किया था, तब तक परमेश्वर ने अंत का कोई जिक्र नहीं किया था, उसने महज मनुष्य को भौतिक आशीषें ही प्रदान की थीं। इसका अर्थ है कि अय्यूब का बाकी का आधा जीवन परमेश्वर की आशीषों के मध्य गुज़रा था, यही वह बात थी जिसने उसे दूसरों से अलग किया था—परन्तु उनके समान ही उसकी उम्र बढ़ने लगी, और किसी भी सामान्य व्यक्ति के समान ही वह दिन भी आया जब उसने संसार को अलविदा कहा।

21 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II भाग सात


अय्यूब की परीक्षाओं के अंत के बाद उसकी गवाही को प्राप्त करने के पश्चात्, परमेश्वर ने यह दृढ़ निश्चय किया था कि वह अय्यूब के समान एक समूह—या एक से अधिक समूह—को हासिल करेगा, फिर भी उसने यह दृढ़ निश्चय किया था कि वह फिर कभी शैतान को अनुमति नहीं देगा कि वह उन माध्यमों का उपयोग करके किसी और का शोषण करे जिनके द्वारा शैतान ने परमेश्वर के साथ शर्त लगाकर अय्यूब की परीक्षा ली थी, उस पर आक्रमण किया था और उसका शोषण किया था; परमेश्वर ने शैतान को अनुमति नहीं दी थी कि वह फिर कभी मनुष्य के साथ ऐसी चीज़ें करे, जो कमज़ोर, मूर्ख एवं अज्ञानी है—इतना काफी था कि शैतान ने अय्यूब की परीक्षा ली थी!

20 फ़र॰ 2019

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II भाग छे: के क्रम में


अय्यूब ने परमेश्वर के चेहरे को नहीं देखा था, या परमेश्वर के द्वारा बोले गए वचनों को नहीं सुना था, और उसने व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के कार्य का अनुभव तो बिलकुल भी नहीं किया था, परन्तु परमेश्वर के प्रति उसके भय एवं अपनी परीक्षाओं के मध्य उसकी गवाही को सभी लोगों के द्वारा देखा गया था, और परमेश्वर के द्वारा उनसे प्रेम किया गया है, उनमें आनन्द मनाया गया है, और उनकी प्रशंसा की गई है, और लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं और उनकी तारीफ करते हैं, और इसके अतिरिक्त, उनका गुणगान करते हैं।

1. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना क्या है? अगर कोई केवल प्रभु के लिए मिशनरी (धर्म-प्रचार सम्बन्धी) काम करता है, तो क्या यह परमेश्वर की इच्छा का पालन करना है?

XVIII. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण क्या है और परमेश्वर में विश्वास की सच्ची गवाही क्या है, इस पर हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाह...