स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग एक
परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग एक
तुम सब परमेश्वर के अधिकार के बारे में पिछली सभा में सुन चुके हो, अब मैं आश्वस्त हूं कि तुम सब उस मुद्दे पर शब्दों की व्यूह रचना के साथ पूर्ण रूप से सुसज्जित हो गए हो। तुम सब कितना अधिक स्वीकार कर सकते हो, आभास कर सकते और समझ सकते हो यह इस पर निर्भर करता है कि तुम सब उसके लिए कितना प्रयास करोगे। यह मेरी आशा है कि तुम सब इस मुद्दे तक बड़े उत्साह से पहुंच सको; तुम लोगों को किसी भी कीमत पर इसके साथ अधूरे मन से व्यवहार नहीं करना चाहिए। अब, क्या परमेश्वर के अधिकार को जानना परमेश्वर की सम्पूर्णता को जानने के समान है? कोई कह सकता है कि परमेश्वर के अधिकार को जानना स्वयं अद्वितीय परमेश्वर को जानने की शुरुआत है, और कोई यह भी कह सकता है कि परमेश्वर के अधिकार को जानने का अर्थ है कि किसी ने स्वयं अद्वितीय परमेश्वर की हस्ती को जानने हेतु पहले से ही द्वार के भीतर कदम रख दिया है। यह समझ परमेश्वर को जानने का एक भाग है। दूसरा भाग क्या है? यह वह विषय है जिसके बारे मैं आज विचार विमर्श करना चाहूंगा - परमेश्वर का धर्मी स्वभाव।