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23 मार्च 2019

आराधना के गी-ज्योति है परमेश्वर का वचन



  •  
  • I
  • जगा दिया मुझे पूरब की बिजली ने,
  • देखा परमेश्वर का वचन देह में प्रकट होते मैंने।
  • न्याय और ताड़ना के वचन,
  • जीतते और बचाते हैं मुझे।
  • टुकड़े-टुकड़े कर दिये मेरे, नाकामियों, इम्तहानों, यातनाओं ने।
  • उजागर हुई भ्रष्टता मेरी
  • अहंकारी था मैं, सिर झुका लिया मैंने।

21 जन॰ 2019

परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग एक


परमेश्वर भिन्न-भिन्न युगों के अनुसार अपने वचन कहता है और अपना कार्य करता है, तथा भिन्न-भिन्न युगों में, वह भिन्न-भिन्न वचन कहता है। परमेश्वर नियमों से नहीं बँधता है, और एक ही कार्य को दोहराता नहीं है, और न अतीत की बातों को लेकर विषाद करता है; वह ऐसा परमेश्वर है जो सदैव नया है, कभी पुराना नहीं होता है, और वह हर दिन नये वचन बोलता है। जिस चीज का आज पालन किया जाना चाहिए उसका तुम्हें पालन करना चाहिए; यही मनुष्य की जिम्मेवारी और कर्तव्य है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि अभ्यास परमेश्वर की वर्तमान रोशनी और वास्तविक वचनों के आस-पास केन्द्रित हो। परमेश्वर नियमों का पालन नहीं करता है, और अपनी बुद्धि और सर्व-सामर्थ्य को प्रकट करने के लिए विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलने में सक्षम है।

18 जन॰ 2019

जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक


 मनुष्यजाति, जो शैतान के द्वारा अत्यधिक भ्रष्ट कर दी गई है, नहीं जानती है कि एक परमेश्वर भी है और इसने परमेश्वर की आराधना करना भी समाप्त कर दिया है। आरम्भ में, जब आदम और हव्वा को रचा गया था, यहोवा का प्रताप और साक्ष्य सर्वदा उपस्थित था। परन्तु भ्रष्ट होने के पश्चात, मनुष्य ने उस प्रताप और साक्ष्य को खो दिया, क्योंकि सभी ने परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया और उसका सम्मान करना पूर्णतया बन्द कर दिया। आज का विजय कार्य उस सम्पूर्ण साक्ष्य और उस सम्पूर्ण प्रताप को पुनः प्राप्त करने, और सभी मनुष्यों से परमेश्वर की आराधना करवाने के लिए है, जिससे सृष्ट वस्तुओं में साक्ष्य हो। कार्य के इस पड़ाव में यही किए जाने की आवश्यकता है। मनुष्यजाति को किस प्रकार जीता जाए?

15 दिस॰ 2018

राज्य का युग वचन का युग है भाग एक


राज्य के युग में, परमेश्वर नए युग की शुरूआत करने, अपने कार्य के साधन बदलने, और संपूर्ण युग में काम करने के लिये अपने वचन का उपयोग करता है। वचन के युग में यही वह सिद्धांत है, जिसके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। वह देहधारी हुआ ताकि विभिन्न दृष्टिकोणों से बातचीत कर सके, मनुष्य वास्तव में परमेश्वर को देख सके, जो देह में प्रकट होने वाला वचन है, और उसकी बुद्धि और आश्चर्य को जान सके। उसने यह कार्य इसलिए किये ताकि वह मनुष्यों को जीतने, उन्हें पूर्ण बनाने और ख़त्म करने के लक्ष्यों को बेहतर ढंग से हासिल कर सके। वचन के युग में वचन को उपयोग करने का यही वास्तविक अर्थ है।

30 नव॰ 2018

तुम किस के प्रति वफादार हो?





जो जीवन तुम हर दिन जीते हो वह अब तुम्हारी नियति और तुम्हारी तकदीर के लिए निर्णायक और बहुत ही महत्वपूर्ण है। अतः जो कुछ तुम्हारे पास है और हर मिनट जो गुज़रता जाता है उसमें तुम्हें आनन्दित होना चाहिए। खुद को सबसे बड़ा लाभ देने के लिए तुम्हें अपने समय का हर सम्भव सदुपयोग करना चाहिए, ताकि तुम अपने जीवन को व्यर्थ में न जियो। शायद तुम इसके बारे में भ्रमित हो कि मैं ये वचन क्यों कह रहा हूँ? खुलकर कहूँ, तो मैं तुम में से किसी के भी कार्यों से प्रसन्न नहीं हूँ। क्योंकि तुम्हारे लिए मुझ में जो आशाएँ हैं वे वैसी नहीं हैं जैसे तुम अब हो। इस प्रकार, मैं इसे इस तरह से प्रकट कर सकता हूँ: तुम सभी खतरे के मुहाने पर हो।

5 नव॰ 2018

परमेश्वर के वचनों की महत्ता


  • परमेश्वर के वचनों की महत्ता

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  • I
  • परमेश्वर के विश्वासियों का कम से कम बर्ताव बेहतर होना चाहिये।
  • है सबसे अहम परमेश्वर के वचन रखना।
  • चाहे कुछ हो जाए, परमेश्वर के वचन से दूर न जाना।
  • परमेश्वर को जानना, ख़ुश करना, होता है उसके वचन से।
  • तमाम पंथ, देश और सम्प्रदाय
  • जीते जाएँगे भविष्य में उसके वचन से।
  • सीधे बात करेगा परमेश्वर लोगों से,
  • अपने हाथों में थामेंगे लोग उसके वचन।
  • लोग इसके ज़रिये पूर्ण बनाए जाँएगे,
  • हर जगह फैलते हैं परमेश्वर के वचन।

27 सित॰ 2018

"जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक

"जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक

1. मनुष्यजाति, जो शैतान के द्वारा अत्यधिक भ्रष्ट कर दी गई है, नहीं जानती है कि एक परमेश्वर भी है और इसने परमेश्वर की आराधना करना भी समाप्त कर दिया है। आरम्भ में, जब आदम और हव्वा को रचा गया था, यहोवा का प्रताप और साक्ष्य सर्वदा उपस्थित था। परन्तु भ्रष्ट होने के पश्चात, मनुष्य ने उस प्रताप और साक्ष्य को खो दिया, क्योंकि सभी ने परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया और उसका सम्मान करना पूर्णतया बन्द कर दिया। आज का विजय कार्य उस सम्पूर्ण साक्ष्य और उस सम्पूर्ण प्रताप को पुनः प्राप्त करने, और सभी मनुष्यों से परमेश्वर की आराधना करवाने के लिए है, जिससे सृष्ट वस्तुओं में साक्ष्य हो। कार्य के इस पड़ाव में यही किए जाने की आवश्यकता है। मनुष्यजाति को किस प्रकार जीता जाए? मनुष्य को सम्पूर्ण रीति से कायल करने के लिए वचनों के इस कार्य का प्रयोग किया जायेगा; उसे पूर्णत: अधीन बनाने के लिए, न्याय, ताड़ना, निर्दयी श्राप और प्रकटीकरण का प्रयोग किया जायेगा; और मनुष्य के विद्रोहीपन को ज़ाहिर करने और उसके विरोध का न्याय करने के द्वारा किया जाएगा; जिससे वह मानवता की अधार्मिकता और अशुद्धता को जान सके, जिसका प्रयोग परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की विशिष्टता दर्शाने के लिए किया जाएगा। मुख्यतः, यह इन वचनों का प्रयोग होगा, जो मनुष्य को जीतते और उसे पूर्णत: कायल करते हैं। शब्द मनुष्यजाति को अन्तिम रूप से जीत लेने के साधन हैं, और वे सभी जो इस जीत लिए जाने को स्वीकार करते हैं, उन्हें इन वचनों के प्रहार और न्याय को भी स्वीकार करना आवश्यक है। बोलने की वर्तमान प्रक्रिया, जीतने की प्रक्रिया है। लोगों को किस प्रकार उपयुक्त सहयोग देना चाहिए? इन वचनों को प्रभावशाली रीति से खाने और पीने से और उन्हें समझने के द्वारा। लोगों को उन्हीं के द्वारा जीता नहीं जा सकता। उन्हें, इन वचनों को खाने और पीने के द्वारा, अपनी भ्रष्टता और अशुद्धता, अपने विद्रोहीपन और अधार्मिकता को जानना है, और परमेश्वर के समक्ष दण्डवत हो जाना है। यदि तुम परमेश्वर की इच्छा को समझ सकते हो और इसे अभ्यास में ला सकते हो, और आगे, दर्शन प्राप्त कर सकते हो, और यदि तुम इन वचनों का पूरी तरह से पालन कर सकते और अपनी ओर से कोई चुनाव नहीं करते हो, तब तुम्हें जीत लिया जाएगा। और ये वह शब्द होंगे, जिन्होंने तुम्हें जीता है। मनुष्यजाति ने वह साक्ष्य क्यों खो दिया? क्योंकि कोई भी अब परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता और परमेश्वर को अपने हृदय में कदापि नही रखता। मनुष्यजाति को जीतने का अर्थ लोगों में इस विश्वास को पुनर्स्थापित करना है। लोगों का ध्यान सर्वदा संसार, अनेक आशाएँ रखने, अपने भविष्य के लिए बहुत अधिक चाहने और अनेक अनावश्यक मांग करने की ओर रहता है। वे सर्वदा अपने शरीर के विषय में सोचते और योजना बनाते रहते हैं और कभी परमेश्वर में विश्वास करने के मार्ग की खोज में रुचि नहीं रखते हैं। उनके हृदयों को शैतान के द्वारा कब्ज़े में कर लिया गया है, उन्होंने परमेश्वर के लिए अपने सम्मान को खो दिया है, और वे अपना हृदय शैतान को समर्पित कर रहे हैं। परन्तु मनुष्य की सृष्टि परमेश्वर के द्वारा की गई थी। मनुष्य परमेश्वर के साक्ष्य को खो चुका है, अर्थात वह परमेश्वर के प्रताप को खो चुका है। मनुष्य को जीतने का उद्देश्य परमेश्वर के लिए मनुष्य के सम्मान के प्रताप को पुनः प्राप्त करना है।

10 सित॰ 2018

परीक्षण माँग करते हैं आस्था की

  • परमेश्वर के वचनों का एक भजन
  • परीक्षण माँग करते हैं आस्था की

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  • I
  • इम्तहानों के वक्त कमज़ोर हो सकता है इन्सान,
  • आ सकते हैं मन में उसके गलत ख़्याल।
  • परमेश्वर की इच्छा को लेकर हो सकता है स्पष्टता का अभाव उसमें,
  • या कौन-सा मार्ग बेहतरीन है अमल वो जिस पर करे।

4 सित॰ 2018

परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग दो

परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है भाग दो


परमेश्वर द्वारा इस युग में बोले गये वचन, व्यवस्था के युग के दौरान बोले गए वचनों से भिन्न हैं, और इसलिए, वे अनुग्रह के युग के दौरान बोले गये वचनों से भी भिन्न हैं। अनुग्रह के युग में, परमेश्वर ने वचन का कार्य नहीं किया, किन्तु समस्त मानवजाति को छुटकारा दिलाने के लिए केवल सलीब पर चढ़ने का वर्णन किया। बाइबिल में केवल यह वर्णन किया गया है कि यीशु को क्यों सलीब पर चढ़ाया जाना था, और सलीब पर उसने कौन-कौन सी तकलीफें सही, और कैसे मनुष्य को परमेश्वर के लिये सलीब पर चढ़ना जाना चाहिए। उस युग के दौरान, परमेश्वर द्वारा किया गया समस्त कार्य सलीब पर चढ़ने के आस-पास केंद्रित था। राज्य के युग के दौरान, देहधारी परमेश्वर ने उन सभी लोगों को जीतने के लिए वचन बोले जिन्होंने उस पर विश्वास किया। यह "वचन का देह में प्रकट होना" है; परमेश्वर इस कार्य को करने के लिए अंत के दिनों में आया है, जिसका अर्थ है कि वह वचन का देह में प्रकट होना के वास्तविक महत्व को कार्यान्वित करने के लिए आया।

16 जुल॰ 2018

परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है

भगवान,भगवान अच्छा है,अच्छा,उजागर हुआ

परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है


बहुत सारी ऐसी चीज़ें हैं जिनके विषय में मैं आशा करता हूँ कि आप उसे प्राप्त करेंगे। फिर भी, आपकी गतिविधियाँ और आपका जीवन मेरी माँगों को सम्पूर्णता से पूरा करने में असमर्थ हैं, इसलिए, सीधे मुद्दे पर आकर अपने दिल और मन की बात आपको समझाता हूं। ये मानते हुए कि आपकी परखने और प्रशंसा करने की योग्यताएँ बेहद कमज़ोर हैं, आप पूरी तरह मेरे विवेक और सार से लगभग बिलकुल अनजान हैं, तो ये अति आवश्यक है कि मैं इसके बारे में आपको सूचित करूँ। इस से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप पहले कितना समझते थे या फिर आप इन विषयों को समझने में इच्छुक हैं कि नहीं, फिर भी मुझे उनके बारे में आपको विस्तारपूर्वक बताना होगा।

30 जून 2018

मसीह के कथन "परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें" (भाग चार के क्रम में)

मसीह के कथन "परमेश्वर के स्वभाव और उसके कार्य के परिणाम को कैसे जानें" (भाग चार के क्रम में)

इस वीडियो में परमेश्वर के वचन "वचन देह में प्रकट हुआ से आगे जारी" पुस्तक से हैं। इस वीडियो की सामग्री: परमेश्वर की मनोवृत्ति को समझना और परमेश्वर के विषय में सभी गलत अवधारणाओं को छोड़ देना मनुष्य के परिणाम को कौन निर्धारित करता है लोग अनुभव के आधार पर परमेश्वर को परिभाषित करने के लिए प्रवृत्त होते हैं ऐसे लोगों के प्रति परमेश्वर की मनोवृत्ति जो उसके कार्य के दौरान भाग जाते हैं

28 जून 2018

New Hindi Christian Song 2018 | सत्य जीवन का सबसे ऊंचा सूत्र है

         New Hindi Christian Song 2018 | सत्य जीवन का सबसे ऊंचा सूत्र है

"सत्य" जीवन के सब सूत्रों में सबसे सच्चा है, और मानवता में सबसे ऊंचा है। जीवन का वह सूत्र है क्योंकि वो है, वो है जो परमेश्वर इंसान से चाहता और वह काम जो उसने खुद किया है, परमेश्वर इंसान से चाहता और वह काम जो उसने खुद किया है। यह किन्हीं बातों से बनाई उक्ति नहीं है, ना कहावत किसी महत की, महत की।

27 जून 2018

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए"

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कथन "विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए"


सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "बीते समयों में, अनेक लोग मनुष्य की महत्वाकांक्षा और धारणाओं के साथ मनुष्य की आशाओं के लिए आगे बढ़े। अब इन मामलों पर चर्चा नहीं की जाएगी। कुंजी है अभ्यास का ऐसा ढंग खोजना जो तुम में से हर एक को परमेश्वर के सम्मुख एक सामान्य स्थिति बनाये रखने और धीरे-धीरे शैतान के प्रभाव की बेड़ियों को तोड़ डालने में सक्षम करे, ताकि तुम परमेश्वर को प्राप्त हो सको और पृथ्वी पर वैसे जियो जैसे परमेश्वर तुमसे चाहता है।

23 जून 2018

परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए

प्रार्थना,ईसाई,पूजा,श्रद्धा,जीवन,प्यार

परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें परमेश्वर की आज्ञाओं का पालन करना चाहिए

तुम परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? अधिकांश लोग इस प्रश्न से हैरान हैं। उनके पास व्यावहारिक परमेश्वर और स्वर्ग के परमेश्वर के बारे में हमेशा से बिलकुल दो भिन्न दृष्टिकोण रहे हैं, जो दिखाता है कि वे आज्ञापालन के लिए नहीं, बल्कि कुछ निश्चित लाभों को प्राप्त करने, या विपत्तियों के कष्ट से बच निकलने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हैं। केवल तभी वे थोड़ा बहुत आज्ञाकारी होते हैं, किन्तु उनकी आज्ञाकारिता सशर्त है, यह उनकी स्वयं की व्यक्तिगत भावी संभावनाओं के वास्ते है, और जो उन पर जबरदस्ती डाली जाती है। इसलिए: तुम परमेश्वर पर विश्वास क्यों करते हो? यदि यह केवल तुम्हारी संभावनाओं, और तुम्हारे भाग्य के लिए है, तो बेहतर है कि तुम विश्वास ही मत करो। इस प्रकार का विश्वास आत्म-वंचना, आत्म-आश्वासन, और आत्म-प्रशंसा है। यदि तुम्हारा विश्वास परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की नींव पर नहीं बना है, तो अंततः तुम्हें परमेश्वर का विरोध करने के परिणामस्वरूप दण्डित किया जाएगा। वे सभी जो अपने विश्वास में परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता की खोज नहीं करते हैं परमेश्वर का विरोध करते हैं। परमेश्वर कहता है कि लोग सत्य की खोज करें, कि वे परमेश्वर के वचन के लिए प्यासे हों, और परमेश्वर के वचनों को खाएँ एवं पीएँ, और उन्हें अभ्यास में लाएँ, ताकि वे परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता को प्राप्त कर सकें। यदि तुम्हारी प्रेरणाएँ सचमुच में इस प्रकार की हैं, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें उठाएगा, और वह निश्चित रूप से तुम्हारे प्रति अनुग्रहपूर्ण होगा। कोई भी इस पर सन्देह नहीं कर सकता है, और कोई भी इसे बदल नहीं सकता है।

14 जून 2018

जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे

जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के आज्ञाकारी हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण एक समान हैं। जो केवल परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं लेकिन उसके कार्य के प्रति समर्पित नहीं होते हैं उन्हें आज्ञाकारी नहीं माना जा सकता है, और उन्हें तो बिल्कुल भी नहीं माना जा सकता है जो सचमुच में समर्पण नहीं करते हैं, और बाहरी तौर पर वे चापलूस हैं।

अंतिम दिनों के मसीह के कथन "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है (III) परमेश्वर का अधिकार (II)" (भाग चार)

अंतिम दिनों के मसीह के कथन "स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है (III) परमेश्वर का अधिकार (II)" (भाग चार)

इस वीडियो में परमेश्वर के वचन "वचन देह में प्रकट हुआ से आगे जारी" पुस्तक से हैं। इस वीडियो की सामग्री: सन्तान: पाँचवां घटनाक्रम 1. किसी व्यक्ति के पास इस पर कोई नियन्त्रण नहीं होता है कि उसकी संतान का क्या होगा 2. अगली पीढ़ी का पालन पोषण करने के बाद, लोग नियति के विषय में एक नई समझ हासिल करते हैं

8 जून 2018

परमेश्वर के कथन "तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो?" What Is True Faith in God?(Hindi)

परमेश्वर के कथन "तुम विश्वास के विषय में क्या जानते हो?" What Is True Faith in God?(Hindi)

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य मुझ पर विश्वास करता है क्योंकि मैं बहुत अनुग्रह रखता हूँ, और प्राप्त करने के लिए और भी बहुत कुछ है। मेरे अनुग्रह के कारण यहूदी मुझ पर विश्वास करते थे, और जहाँ कहीं मैं जाता था मेरा अनुसरण करते थे। सीमित ज्ञान और अनुभव के ये निर्बुद्धि मनुष्य केवल उन चिन्हों और चमत्कारों की खोज करते थे जो मैं प्रकट करता था।

7 जून 2018

New Hindi Christian Song 2018 | यीशु के प्रति फ़रीसियों के विरोध का मूल कारण


New Hindi Christian Song 2018 | यीशु के प्रति फ़रीसियों के विरोध का मूल कारण

यीशु के प्रति फ़रीसियों के विरोध का मूल कारण जानना चाहोगे फरीसी, यीशु के ख़िलाफ़ क्यों थे? जानना चाहोगे उनका सार-तत्व क्या है? जानना चाहोगे फरीसी, यीशु के ख़िलाफ़ क्यों थे? जानना चाहोगे उनका सार-तत्व क्या है? बस उनके ख़्यालों में था मसीहा, यकीं करते थे, आयेगा वो इक दिन, खोजते नहीं ज़िंदगी की सच्चाई।

The Word of the Holy Spirit | परमेश्वर के कथन "क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?" (Hindi)

The Word of the Holy Spirit | परमेश्वर के कथन "क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?" (Hindi)

सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं: "तुम लोग केवल स्वर्ग के अनदेखे परमेश्वर को चाहते हो और भय मानते हो और धरती पर जीते-जागते मसीह के लिए कोई सम्मान नहीं है। क्या यह भी तुम्हारा अविश्वास नहीं है? तुम सब केवल अतीत में कार्य करने वाले परमेश्वर के लिए लालायित रहते हो परन्तु आज के मसीह का सामना तक नहीं करते। ये हमेशा से "विश्वास" है जो तुम्हारे हृदय में घुलमिल जाता है, जो आज के मसीह पर विश्वास नहीं करता। मैं तुम्हारे महत्व को कम करके नहीं आंकता, क्योंकि तुम्हारे भीतर अत्यधिक अविश्वास है, तुम लोगों में बहुत ज्यादा अशुद्धि है और इसे काटकर अलग करना आवश्यक है।

1. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना क्या है? अगर कोई केवल प्रभु के लिए मिशनरी (धर्म-प्रचार सम्बन्धी) काम करता है, तो क्या यह परमेश्वर की इच्छा का पालन करना है?

XVIII. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण क्या है और परमेश्वर में विश्वास की सच्ची गवाही क्या है, इस पर हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाह...