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7 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग चार



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग चार 

परमेश्वर का धर्मी स्वभाव     भाग चार
नीनवे के लोगों के हृदयों में सच्चे पश्चाताप से उन्होंने परमेश्वर की दया को प्राप्त किया और उस ने उनके अंत को बदल दिया
क्या वहां परमेश्वर के हृदय के बदलाव और उसके क्रोध के बीच कोई परस्पर विरोध था? नहीं, बिलकुल भी नहीं! यह इसलिए है क्योंकि उस विशेष समय पर परमेश्वर की सहनशीलता का अपना कारण था। इसका कारण क्या हो सकता है? यह वह है जिसे बाईबिल में दिया गया है: "प्रत्येक व्यक्ति अपने-अपने कुमार्ग से फिर गया," और अपने हाथों के उपद्रवी कार्यों को तज दिया।
यह "कुमार्ग" कुछ मुटठीभर बुरे कार्यों की और संकेत नहीं करता है, परन्तु लोगों के व्यवहार के पीछे पाए जाने वाले बुरे स्रोत की और संकेत करता है। "अपने कुमार्ग से फिर जाना" इसका अर्थ है कि जिन पर सन्देह है वे कभी भी इन कार्यों को दोबारा नहीं करेंगे। दूसरे शब्दों में, वे पुन: इस बुरे तरीके से व्यवहार नहीं करेंगे;

6 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग तीन



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II परमेश्वर का धर्मी स्वभाव भाग तीन

परमेश्वर का धर्मी स्वभाव     भाग तीन

(II) सच्चे पश्चाताप के जरिए मानवता परमेश्वर की करुणा और सहनशीलता को प्राप्त करती है।
जो आगे दिया गया है वह "परमेश्वर द्वारा नीनवे का उद्धार" की बाइबल की कहानी है।
(योना 1:1-2) यहोवा का यह वचन अमित्तै के पुत्र योना के पास पहुंचा। "उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और उसके विरुद्ध प्रचार कर क्योंकि उसकी बुराई मेरी दृष्टि में बढ़ गई है।"
(योना 3) "तब यहोवा का यह वचन दूसरी बार योना के पास पहुंचा। "उठकर उस बड़े नगर नीनवे को जा, और जो बात मैं तुझ से कहूँगा उसका उस में प्रचार कर।" तब योना यहोवा के वचन के अनुसार नीनवे को गया। नीनवे एक बहुत बड़ा नगर था, वह तीन दिन की यात्रा का था। योना ने नगर में प्रवेश करके एक दिन की यात्रा पूरी की और यह प्रचार करता गया, "अब से चालीस दिन के बीतने पर नीनवे उलट दिया जाएगा।" तब नीनवे के मनुष्यों ने परमेश्वर के वचन की प्रतीति की, और उपवास का प्रचार किया गया और बड़े से लेकर छोटे तक सभी ने टाट ओढ़ा। तब यह समाचार नीनवे के राजा के कान में पहुंचा, और उसने सिंहासन पर से उठ, अपने राजकीय वस्त्र उतारकर टाट ओढ़ लिया, और राख पर बैठ गया। राजा ने प्रधानों से सम्मति लेकर नीनवे में इस आज्ञा का ढिंढोरा पिटवायाः राजा और उसके सरदारों के आदेश से, कहते हुए, "क्या मनुष्य, क्या गाय-बैल, क्या भेड़-बकरी, या अन्य पशु, कोई कुछ भी न खाने पाए, वे न खाएं और न पानी पिएं।" मनुष्य और पशु दोनों टाट ओढ़ें और वे परमेश्वर की दोहाई चिल्ला-चिल्ला कर दें, और अपने कुमार्ग से फिरें, और उस उपद्रव से, जो वे करते है, पश्चाताप करें। संभव है, परमेश्वर दया करे और अपनी इच्छा बदल ले और उसका भड़का हुआ कोप शांत हो जाए और हम नष्ट होने से बच जाएँ। जब परमेश्वर ने उनके कामों को देखा, कि वे कुमार्ग से फिर रहे हैं, तब परमेश्वर ने अपनी इच्छा बदल दी, और उनकी जो हानि करने की ठानी थी, उसको न किया।"

3 अप्रैल 2019

स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I परमेश्वर का अधिकार (I) भाग पांच के क्रम में



स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I परमेश्वर का अधिकार (I) भाग पांच के क्रम में

परमेश्वर का अधिकार (I)     भाग पांच के क्रम में
क्या अब तुम लोगों के पास परमेश्वर के अधिकार का एक नया ज्ञान है? पहला, परमेश्वर का अधिकार जिसका अभी जिक्र किया गया, और मनुष्य की सामर्थ में एक अन्तर है। और वह अन्तर क्या है? कुछ लोग कहते हैं कि दोनों के बीच कोई तुलना नहीं की जा सकती है। यह सही है! यद्यपि लोग कहते हैं कि दोनों के बीच में कोई तुलना नहीं की जा सकती है, फिर भी मनुष्य के विचारों और धारणाओं में कई बार उन दोनों को अगल बगल रखकर तुलना करते हुए मनुष्य की सामर्थ अकसर अधिकार के साथ भ्रम में पड़ जाती है। यहाँ पर क्या हो रहा है? क्या लोग असावधानी से एक को दूसरे से बदलने की ग़लती नहीं कर रहे हैं? ये दोनों जुड़े हुए नहीं हैं, उनके बीच में कोई तुलना नहीं है, फिर भी लोग अपने आपकी सहायता नहीं कर सकते हैं। इस का समाधान कैसे किया जाना चाहिए? यदि तुम सचमुच में एक समाधान चाहते हो, तो उसका एकमात्र तरीका परमेश्वर के अधिकार को समझना और जानना है। सृष्टिकर्ता के अधिकार और सामर्थ को समझने और जानने के बाद, तुम एक ही साँस में मनुष्य की सामर्थ और परमेश्वर के अधिकार का जिक्र नहीं करोगे।

25 मार्च 2019

आराधना के गी-अंत तक अनुसरण करने के लिये आत्मा के कार्य का पालन करो



  • अंत तक अनुसरण करने के लिये आत्मा के कार्य का पालन करो

  •  
  • I
  • पवित्र आत्मा का कार्य दिन ब दिन बदलता है,
  • उच्च प्रकटीकरण के साथ कदम दर कदम ऊपर चढ़ता है।
  • ऐसे ही इंसान को पूर्ण करने के लिए परमेश्वर करता है काम।
  • "इंसान अगर चल पाता नहीं इस गति से,
  • तो छूट सकता है वो पीछे।"
  • एक आज्ञाकारी हृदय के बिना,
  • अंत तक अनुसरण कर सकता नहीं इंसान।

18 जन॰ 2019

जीतने वाले कार्य का भीतरी सत्य" पर परमेश्वर के वचन के चार अंशों से संकलन भाग एक


 मनुष्यजाति, जो शैतान के द्वारा अत्यधिक भ्रष्ट कर दी गई है, नहीं जानती है कि एक परमेश्वर भी है और इसने परमेश्वर की आराधना करना भी समाप्त कर दिया है। आरम्भ में, जब आदम और हव्वा को रचा गया था, यहोवा का प्रताप और साक्ष्य सर्वदा उपस्थित था। परन्तु भ्रष्ट होने के पश्चात, मनुष्य ने उस प्रताप और साक्ष्य को खो दिया, क्योंकि सभी ने परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया और उसका सम्मान करना पूर्णतया बन्द कर दिया। आज का विजय कार्य उस सम्पूर्ण साक्ष्य और उस सम्पूर्ण प्रताप को पुनः प्राप्त करने, और सभी मनुष्यों से परमेश्वर की आराधना करवाने के लिए है, जिससे सृष्ट वस्तुओं में साक्ष्य हो। कार्य के इस पड़ाव में यही किए जाने की आवश्यकता है। मनुष्यजाति को किस प्रकार जीता जाए?

29 दिस॰ 2018

भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग एक(1)


परमेश्वर ने देहधारण किया क्योंकि शैतान का आत्मा, या कोई अभौतिक चीज़ उसके कार्य का विषय नहीं है, परन्तु मनुष्य है, जो शरीर से बना है और जिसे शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया गया है। निश्चित रूप से चूँकि मनुष्य की देह को भ्रष्ट किया गया है इसलिए परमेश्वर ने हाड़-मांस के मनुष्य को अपने कार्य का विषय बनाया है; इसके अतिरिक्त, क्योंकि मनुष्य भ्रष्टता का विषय है, उसने मनुष्य को अपने उद्धार के कार्य के समस्त चरणों के दौरान अपने कार्य का एकमात्र विषय बनाया है। मनुष्य एक नश्वर प्राणी है, और वह हाड़-मांस एवं लहू से बना हुआ है, और एकमात्र परमेश्वर ही है जो मनुष्य को बचा सकता है। इस रीति से, परमेश्वर को अपना कार्य करने के लिए ऐसा देह बनना होगा जो मनुष्य के समान ही गुणों को धारण करता है, ताकि उसका कार्य बेहतर प्रभावों को हासिल कर सके।

7 दिस॰ 2018

सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है


अधिकांश लोग अपनी भविष्य की नियति के लिए, या अल्पकालिक आनन्द के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं। क्योंकि ऐसे लोग जो किसी व्यवहार से होकर नहीं गुज़रे हैं, परमेश्वर में उनका विश्वास स्वर्ग में प्रवेश करने के लिए, एवं प्रतिफल अर्जित करने के लिए होता है। यह सिद्ध किए जाने के लिए, या परमेश्वर के किसी प्राणी के कर्तव्य को निभाने के लिए नहीं होता है। कहने का तात्पर्य है कि अधिकांश लोग अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाने के लिए, या अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं करते हैं। अर्थपूर्ण ज़िन्दगियों को जीने के लिए बिरले ही लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, और न ही ऐसे लोग हैं जो विश्वास करते हैं कि जबसे मनुष्य जीवित है, उन्हें परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए क्योंकि यह स्वर्ग की व्यवस्था है और पृथ्वी का सिद्धान्त है कि ऐसा करें, और यह मनुष्य का स्वाभाविक पेशा है।

28 नव॰ 2018

क्या आप जाग उठे हैं?


क्या आप जाग उठे हैं?
जब आप सामान्य मनुष्यत्व से बाहर निकलकर जीवन व्यतित करना प्राप्त कर लेते हैं, और पूर्ण कर दिए गए हैं, तो हालांकि आप भविष्यवाणी करने, या कोई रहस्य बताने में असमर्थ होंगे, आप एक मनुष्य के स्वरूप को प्रगट करेंगे और जीवन व्यतित करेंगे। परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की, जिसके बाद मनुष्य शैतान द्वारा भ्रष्ट किया गया, और इस भ्रष्टाचार ने मनुष्यों को मृत देह बना दिया - और परिणामस्वरूप आपके बदलने के बाद, आप इन मृत देहों से भिन्न हो जाएंगे। वह परमेश्वर के वचन हैं जो लोगों की आत्मा को जीवन देते हैं और उन्हें नया जन्म देते हैं, और जब लोगों की आत्माएं नया जन्म लेंगी वे जाग उठेंगे। 'मृतक' का

27 नव॰ 2018

दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए



दस प्रशासनिक आज्ञाएँ जिनका परमेश्वर के चयनित लोगों द्वारा राज्य के युग में पालन अवश्य किया जाना चाहिए
1.मनुष्य को स्वयं को बड़ा नहीं ठहराना चाहिए, और न ही अपने आपको ऊँचा ठहराना चाहिए। उसे परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए और परमेश्वर को ऊँचा ठहराना चाहिए।
2. तुम्हें ऐसा कुछ भी करना चाहिए जो परमेश्वर के कार्य के लिए लाभदायक हो, और ऐसा कुछ भी नहीं करना चाहिए जो परमेश्वर के कार्य के लिए हानिकारक हो। तुम्हें परमेश्वर के नाम, परमेश्वर की गवाही, और परमेश्वर के कार्य का समर्थन करना चाहिए।

21 नव॰ 2018

परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे



परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग हमेशा के लिए उसके प्रकाश में रहेंगे
अधिकांश लोगों का परमेश्वर पर विश्वास का आधार दृढ धार्मिक विश्वास होता हैः वे परमेश्वर को प्रेम करने के योग्य नहीं होते हैं, और परमेश्वर का अनुसरण केवल एक रोबोट की तरह ही कर सकते हैं, उनमें परमेश्वर के प्रति सच्ची तड़प या भक्ति नहीं होती। वे मात्र चुपचाप उसका अनुसरण करते हैं। बहुत से लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं परन्तु केवल कुछ ही हैं जो उसको प्रेम करते हैं; वे केवल परमेश्वर का भय इसलिए मानते हैं क्योंकि वे तबाही से डरते हैं, या फिर वे परमेश्वर की आराधना करते हैं क्योंकि वह ऊँचा और शक्तिमान है - परन्तु उनके श्रद्धा और आदर में कोई प्रेम या वास्तविक ललक नहीं होती है।

19 नव॰ 2018

सेवा के धार्मिक तरीके पर अवश्य प्रतिबंध लगना चाहिए



सेवा के धार्मिक तरीके पर अवश्य प्रतिबंध लगना चाहिए
संपूर्ण जगत में अपने कार्य की शुरूआत से ही, परमेश्वर ने अनेक लोगों को अपनी सेवा के लिए पूर्वनियत किया है, जिसमें हर व्यवसाय के लोग शामिल हैं। उसका प्रयोजन अपनी स्वयं की इच्छा को पूरा करना है और यह सुनिश्चित करना है कि पृथ्वी पर उसके कार्य को निर्बाध रूप से सफलता तक पहुँचाया जाए। परमेश्वर का लोगों को अपनी सेवा हेतु चुनने का यही प्रयोजन है। परमेश्वर की सेवा करने वाले हर व्यक्ति को परमेश्वर की इस इच्छा को अवश्य समझना चाहिए। उसके इस कार्य के माध्यम से, लोग परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को बेहतर ढंग से देखने, और पृथ्वी पर उसके कार्य के सिद्धान्तों को देखने में समर्थ होते हैं। वास्तव में परमेश्वर अपना काम करने, लोगों के संपर्क में आने के लिए पृथ्वी पर आता है, ताकि वे उसके कर्मों को अधिक स्पष्ट रूप से जान सकें।

16 नव॰ 2018

केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है



केवल वह जो परमेश्वर के कार्य को अनुभव करता है वही परमेवर में सच में विश्वास करता है

यद्यपि बहुत से लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, किंतु बहुत कम लोग समझते हैं कि परमेश्वर पर विश्वास करने का अर्थ क्या है, और परमेश्वर के मन के अनुरूप बनने के लिये उन्हें क्या करना चाहिए। ऐसा इसलिए है क्योंकि यद्यपि लोग "परमेश्वर" शब्द और "परमेश्वर का कार्य" जैसे वाक्यांश से परिचित हैं, किंतु वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं, और उससे भी कम वे उसके कार्य को जानते हैं। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि तब वे सभी जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं, वे दुविधायुक्त विश्वास रखते हैं। लोग परमेश्वर पर विश्वास करने को गंभीरता से नहीं लेते हैं, क्योंकि परमेश्वर पर विश्वास करना उनके लिये अत्यधिक अनजाना और अजीब है।

2 नव॰ 2018

परमेश्वर इंसान को अधिकतम सीमा तक बचाना चाहता है

  • परमेश्वर के वचनों का एक भजन
  • परमेश्वर इंसान को अधिकतम सीमा तक बचाना चाहता है
  •  
  • I
  • अपने उद्धार कार्य के दौरान,
  • जिनको बचाया जा सकता है,
  • अधिकतम सीमा तक उन्हें बचाएगा परमेश्वर,
  • और त्यागेगा किसी को नहीं परमेश्वर।
  • मगर जो बदल नहीं सकते स्वभाव अपना,
  • या जो पालन नहीं कर सकते परमेश्वर की आज्ञा का,
  • ऐसे लोग दण्ड के भागी होंगे।

31 अक्टू॰ 2018

परमेश्वर ने बचाया है मुझे


परमेश्वर ने बचाया है मुझे

  • I
  • परमेश्वर ने बचाया है मुझे।
  • मानव सा देहधारी हुआ, सह कर आँधी-तूफान,
  • मनुष्यों में छिप कर, कोई उसे न जान सका।
  • मुझे बचाने को न्याय किया, शुद्ध करने को ताड़ना दिया;
  • जिसमें दर्द मैंने सहे।
  • मैंने दिल से ईश्वर को किया प्यार,
  • उसकी करुणा, अनुग्रह का आनंद लिया।
  • बिन परमेश्वर के उद्धार के,
  • मेरा अंत – तन्हाई और विनाश है और बिन अनुग्रह के है।

17 अक्टू॰ 2018

एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है

एक वास्तविक मनुष्य होने का क्या अर्थ है

मनुष्य का प्रबंधन करना मेरा कार्य है, और मेरे द्वारा उसे जीत लिया जाना और भी अधिक कुछ चीज़ है जो तब नियत की गई थी जब मैंने संसार की रचना की थी। हो सकता है कि लोग नहीं जानते हों कि अंत के दिनों में मैं उन्हें पूरी तरह से जीत लूँगा और हो सकता है कि वे इस बारे में भी अनजान हों कि मानवजाति में से विद्रोही लोगों को जीत लेना ही शैतान को मेरे द्वारा हराने का प्रमाण है। परन्तु जब मेरा शत्रु मेरे साथ संघर्ष में शामिल हुआ, तो मैंने उसे पहले से ही बता दिया था कि मैं उन सभी को जिन्हें शैतान ने बंदी बना लिया था और अपनी संतान बना लिया था और उसके घर की निगरानी करने वाले उसके वफादार सेवकों को जीतने वाला बनूँगा। जीतने का मूल अर्थ है—परास्त करना, अपमान के अधीन करना है। इस्राएलियों की भाषा में, इसका अर्थ पूरी तरह से परास्त करना, नष्ट करना, और मेरे विरुद्ध आगे विद्रोह करने में अक्षम कर देना है। परन्तु आज जैसे कि तुम लोगों के बीच उपयोग किया जाता है, इसका अर्थ है जीतना। तुम लोगों को पता होना चाहिए कि मेरा अभिप्राय मानवजाति से शैतान को पूरी तरह से समाप्त और निकाल बाहर करना है, ताकि वह मेरे विरुद्ध अब और विद्रोह न कर सके, मेरे कार्य में अवरोध उत्पन्न करने या उसे अस्तव्यस्त करने के लिए तो दम भी न ले सके। इस प्रकार, जहाँ तक मनुष्य का सवाल है, इसका अर्थ जीतना हो गया है। शब्द के चाहे कुछ भी अर्थ हों, मेरा कार्य मानवजाति को हराना है। क्योंकि, जबकि यह सत्य है कि मानवजाति मेरे प्रबंधन में एक अनुबंध है, परन्तु सटीक रूप से कहें तो, मानवजाति मेरी शत्रु के अलावा अन्य कुछ नहीं है। मानवजाति वह बुराई है जो मेरा विरोध और मेरी अवज्ञा करती है। मानवजाति मेरे द्वारा श्रापित दुष्ट की संतान के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है। मानव जाति उस प्रधान दूत के वंशज के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है जिसने मेरे साथ विश्वासघात किया था। मानव जाति उस शैतान की विरासत के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं है जो बहुत पहले ही मेरे द्वारा ठुकराया गया, हमेशा से मेरा कट्टर विरोधी शत्रु रहा है।

12 अक्टू॰ 2018

मेरा घर कहां है

  • आराधना गीत
  • मेरा घर कहां है

  •  
  • I
  • अपने नन्हें काग़ज़ पर रंगों से,
  • नन्हा-सा घर बनाती हूं मैं,
  • प्यारी मम्मी घर में है, प्यारे पापा भी घर पर हैं।
  • अपनी प्यारी बहना के संग खेलूं मैं,
  • खिली-खिली धूप में,
  • हम सब तपन से भर जाते हैं।
  • मम्मी भी ख़ुश है, पापा भी ख़ुश हैं,
  • हम दोनों बहनें भी ख़ुश हैं,
  • बस ख़ुशियां ही ख़ुशियां हैं।
  • काग़ज़ पर रंगों में सिमटा, ये मेरा परिवार है।
  • ये मेरे मीठे सपनों का, प्यारा-सा संसार है।
  • II
  • अपना नन्हा बैग उठाकर,
  • चल दी मैं अनजान नगर,
  • पापा घर के अंदर हैं, पर मम्मी बाहर।
  • मैं और मेरा नन्हा बैग जाते उस घर,
  • कभी जो जाना-पहचाना था।
  • मम्मी घर के अंदर है, पर पापा बाहर।
  • अपना नन्हा बैग उठाकर, भटक रही हूं राहों में,
  • जाना कहां, समझ नहीं पाती, भटक रही हूं राहों में।
  • मेरा नन्हा बैग ही बस मेरा इकलौता साथी है,
  • बस ये ही मेरा घर है जिसको, छोड़ नहीं पाती हूं मैं।

8 अक्टू॰ 2018

सर्वशक्तिमान परमेश्वर का पवित्र आध्यात्मिक देह प्रकट हो चुका है

  • परमेश्वर के वचनों का एक भजन
  •  

  • I
  • प्रकट कर दिया है अपना महिमामय देह,
  • सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने सम्मुख सबके।
  • हो चुका है प्रकट उनका पवित्र देह;
  • स्वयं परमेश्वर है वो: पूर्ण सच्चा परमेश्वर है वो।
  • जगत बदला है पूरा तो बदला है देह भी।
  • परमेश्वर का व्यक्तित्व है रूपांतरण उसका, स्वर्ण मुकुट सिर पर उसके।
  • सफ़ेद लबादा तन पर, स्वर्ण बंध वक्ष पर उसके।
  • हर चीज़ जगत की है चरण-पीठ उसकी, आँखें अग्नि-लौ की मानिंद उसकी,
  • दुधारी तलवार मुख में, दाएं हाथ में सप्त-तारे।
  • राज्य-पथ असीम और प्रकाशमान,
  • उदित होकर जगमगाती महिमा परमेश्वर की।

6 अक्टू॰ 2018

परमेश्वर का कार्य सचमुच है शानदार


  • आराधना गीत
  • परमेश्वर का कार्य सचमुच है शानदार
  •  
  • I
  • बादल पर्वत को घेरकर, जाने के इच्छुक नहीं होते।
  • तुम्हारा प्रेम हमारे ह्रदय के तार को अपनी तरफ खींचता है,
  • हज़ारों-लाखों जोशीले हृदयों पर अपना प्रभाव छोड़ता है,
  • हमें अपने और भी करीब लाता है।
  • हे परमेश्वर, तुमने सारी महिमा प्राप्त कर ली
  • और सिय्योन पर्वत पर लौट गए।
  • तुम्हारे वचन रहते हैं हमारे साथ, क्रियाशील हैं हमारे भीतर।
  • तुम्हारे वचन घोषणा करते हैं,
  • स्वर्ग और धरती में आता है बड़ा बदलाव,
  • मृत को मिल जाता जीवन।

5 अक्टू॰ 2018

देहधारी परमेश्वर ही बचा सकता है इंसान को पूरी तरह

  • परमेश्वर के वचनों का एक भजन
  • देहधारी परमेश्वर ही बचा सकता है इंसान को पूरी तरह
  •  
  • I
  • किसी आत्मा के ज़रिये या आत्मा के रूप में
  • नहीं आता परमेश्वर इंसान को बचाने,
  • जिसे कोई देख न पाए, छू न पाए, न जिस तक इंसान पहुँच पाए।
  • परमेश्वर गर बचाता इंसान को रूह की तरह, न कि सृजित इंसान की तरह,
  • तो उससे न कोई उद्धार पाता, न ही कोई बच पाता।
  • परमेश्वर बनता है एक सृजित मानव, रखता है देह में अपने वचन।
  • ताकि वो प्रदान कर सके अनुयायियों को अपने वचन।
  • ताकि इंसान सुन सके, देख सके, पा सके उसके वचन।
  • इसके ज़रिये इंसान को सचमुच बचाया जा सकता है उसके पापों से।

4 अक्टू॰ 2018

भ्रष्ट मानवजाति को देह धारण किए हुए परमेश्वर के उद्धार की अत्यधिक आवश्यकता है भाग दो


मनुष्य को शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, और वह परमेश्वर के सभी जीवधारियों में सबसे ऊपर है, अतः मनुष्य को परमेश्वर के उद्धार की आवश्यकता है। परमेश्वर के उद्धार का विषय मनुष्य है, न कि शैतान, और जिसे बचाया जाना चाहिए वह मनुष्य की देह है, एवं मनुष्य का प्राण है, और शैतान नहीं है। शैतान परमेश्वर के सम्पूर्ण विनाश का विषय है, मनुष्य परमेश्वर के उद्धार का विषय है, और मनुष्य के शरीर को शैतान के द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है, अतः जिसे पहले बचाना है वह मनुष्य का शरीर ही होगा। मनुष्य की देह को बहुत ज़्यादा भ्रष्ट किया जा चुका है, और यह कुछ ऐसा बन गया है जो परमेश्वर का विरोध करता है, जो यहाँ तक कि खुले तौर पर परमेश्वर का विरोध करता है और उसके अस्तित्व को भी नकारता है। इस भ्रष्ट देह का उपचार करना बहुत ही मुश्किल है, और देह के भ्रष्ट स्वभाव की अपेक्षा किसी और चीज़ के साथ निपटना या उसे बदलना ज़्यादा कठिन नहीं है। शैतान परेशानियां खड़ी करने के लिए मनुष्य की देह के भीतर आता है, और परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी डालने के लिए मनुष्य की देह का उपयोग करता है, और परमेश्वर की योजना को बाधित करता है, और इस प्रकार मनुष्य शैतान, एवं परमेश्वर का शत्रु बन चुका है। मनुष्य को बचाने के लिए, पहले उस पर विजय पाना होगा। यही कारण है कि परमेश्वर चुनौती के लिए उठता है, और देह में होकर आता है कि वह कार्य करे जिसे उसने करने का इरादा किया है, और शैतान के साथ लड़े। उसका उद्देश्य मनुष्य का उद्धार है, जिसे भ्रष्ट किया जा चुका है, और शैतान की पराजय एवं उसका सम्पूर्ण विनाश है, जो उसके विरुद्ध विद्रोह करता है। वह मनुष्य पर विजय पाने के अपने कार्य के जरिए शैतान को पराजित करता है, और ठीक उसी समय भ्रष्ट मानवजाति का उद्धार करता है।

1. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना क्या है? अगर कोई केवल प्रभु के लिए मिशनरी (धर्म-प्रचार सम्बन्धी) काम करता है, तो क्या यह परमेश्वर की इच्छा का पालन करना है?

XVIII. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण क्या है और परमेश्वर में विश्वास की सच्ची गवाही क्या है, इस पर हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाह...