2 नव॰ 2018

परमेश्वर इंसान को अधिकतम सीमा तक बचाना चाहता है

  • परमेश्वर के वचनों का एक भजन
  • परमेश्वर इंसान को अधिकतम सीमा तक बचाना चाहता है
  •  
  • I
  • अपने उद्धार कार्य के दौरान,
  • जिनको बचाया जा सकता है,
  • अधिकतम सीमा तक उन्हें बचाएगा परमेश्वर,
  • और त्यागेगा किसी को नहीं परमेश्वर।
  • मगर जो बदल नहीं सकते स्वभाव अपना,
  • या जो पालन नहीं कर सकते परमेश्वर की आज्ञा का,
  • ऐसे लोग दण्ड के भागी होंगे।
  • II
  • इस चरण के कार्य से, वचनों के कार्य से,
  • इंसान के सामने ऐसे रास्ते खुलेंगे,
  • इंसान के सामने ऐसे राज़ खुलेंगे
  • समझता नहीं है इंसान जिन्हें।
  • इससे इंसान परमेश्वर की इच्छा से वाकिफ़ होगा,
  • परमेश्वर की अपेक्षाओं से वाकिफ़ होगा।
  • ताकि परमेश्वर के वचनों को अमल में लाकर,
  • बदल सके स्वभाव अपना इंसान।
  • III
  • अपने कार्य के लिए बस वचन, इस्तेमालकरता है परमेश्वर।
  • इन्सान के थोड़े-से विद्रोह के लिये,
  • सज़ा नहीं देता है उसे परमेश्वर
  • क्योंकि अब उद्धार का वक्त है।
  • सभी विद्रोहियों को गर सज़ा देता परमेश्वर
  • तो किसी को नहीं मिलता बचाए जाने का अवसर।
  • नरक में पड़े होते सभी सज़ा पाकर।
  • न्याय के वचन से इंसान ख़ुद को जानकर,
  • परमेश्वर की आज्ञा मानता है,
  • न्याय के इन वचनों से इंसान सज़ा नहीं पाता है।
  • IV
  • जो वचनों की विजय को स्वीकारेंगे,
  • उनके उद्धार के अवसर होंगे बहुतेरे।
  • परमेश्वर का उद्धार कार्य
  • उनके प्रति नर्म और सहिष्णु होगा।
  • अगर गलत राह से इंसान लौट आएगा,
  • अगर इंसान पश्चाताप करेगा,
  • तो परमेश्वर उद्धार का अवसर देगा।
  • V
  • जब पहली बार इंसान विद्रोह करता है परमेश्वर से,
  • तो परमेश्वर उसे मौत नहीं देना चाहता है,
  • बल्कि उसे बचाने की ख़ातिर, वो सबकुछ ही करता है।
  • जब किसी को बचाने की गुंजाईश नहीं होती,
  • तो दरकिनार कर देता है उसे परमेश्वर।
  • सज़ा को टालता है परमेश्वर,
  • क्योंकि जिन्हें बचाया जा सकता है, उन्हें बचाना चाहता है परमेश्वर।
  • महज़ वचनों से वो न्याय, रहनुमाई करता है, प्रबुद्ध करता है इंसान को,
  • छड़ से मारता नहीं वो इंसान को।
  • वचनों से बचाना मकसद है,
  • मायने हैं इस आख़िरी चरण के कार्य के।
  •  
  • "वचन देह में प्रकट होता है" से

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