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2 नव॰ 2018

परमेश्वर इंसान को अधिकतम सीमा तक बचाना चाहता है

  • परमेश्वर के वचनों का एक भजन
  • परमेश्वर इंसान को अधिकतम सीमा तक बचाना चाहता है
  •  
  • I
  • अपने उद्धार कार्य के दौरान,
  • जिनको बचाया जा सकता है,
  • अधिकतम सीमा तक उन्हें बचाएगा परमेश्वर,
  • और त्यागेगा किसी को नहीं परमेश्वर।
  • मगर जो बदल नहीं सकते स्वभाव अपना,
  • या जो पालन नहीं कर सकते परमेश्वर की आज्ञा का,
  • ऐसे लोग दण्ड के भागी होंगे।

28 अक्टू॰ 2018

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग चार

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग चार


आगे, आओ इन निम्नलिखित अंशों को पढ़ें।
6. पहाड़ी उपदेश
1) धन्य वचन (मत्ती 5:3-12)
2) नमक और ज्योति (मत्ती 5:13-16)
3) व्यवस्था (मत्ती 5:17-20)
4) क्रोध (मत्ती 5:21-26)
5) व्यभिचार (मत्ती 5:27-30)
6) तलाक (मत्ती 5:31-32)
7) मन्नतें (मत्ती 5:33-37)
8) आँख के बदले आँख (मत्ती 5:38-42)
9) अपने शत्रुओं से प्रेम करो (मत्ती 5:43-48)
10) देने के विषय निर्देश (मत्ती 6:1-4)
11) प्रार्थना (मत्ती 6:5-8)
7. प्रभु यीशु के दृष्टान्त
1) बीज बोनेवाले का दृष्टान्त (मत्ती 13:1-9)
2) जंगली पौधों का दृष्टान्त (मत्ती 13:24-30)
3) राई के दाने का दृष्टान्त (मत्ती 13:31-32)
4) खमीर का दृष्टान्त (मत्ती 13:33)
5) जंगली बीजों के दृष्टान्त की व्याख्या (मत्ती 13:36-43)
6) अनमोल धन का दृष्टान्त (मत्ती13:44)
7) अनमोल मोती का दृष्टान्त (मत्ती13:45-46)
8) जाल का दृष्टान्त (मत्ती 13:47-50)
8. आज्ञाएँ
(मत्ती 22:37-39) उसने उससे कहा, तू परमेश्वर अपने प्रभु से अपने सारे मन और अपने सारे प्राण और अपनी सारी बुद्धि के साथ प्रेम रख। बड़ी और मुख्य आज्ञा तो यही है। और उसी के समान यह दूसरा भी है कि तू अपने पड़ोसी से अपने समान प्रेम रख।

27 अक्टू॰ 2018

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II भाग चार

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II भाग चार

अय्यूब की अटल सत्यनिष्ठा ने शैतान को लज्जित किया और उसे भयातुर करके खदेड़ दिया

और परमेश्वर ने क्या किया जब अय्यूब को इस पीड़ा के अधीन किया गया था? परमेश्वर ने परिणाम का अवलोकन किया, और उसे देखा, और उसका इंतजार किया। जब परमेश्वर ने अवलोकन किया एवं देखा, तो उसने कैसा महसूस किया था? हाँ वास्तव में उसने गहरा शोक महसूस किया। परन्तु उसकी पीड़ा के परिणामस्वरूप, क्या वह शैतान को अय्यूब की परीक्षा लेने की अनुमति देने के लिए खेदित था? उसका उत्तर है, नहीं, वह खेदित नहीं था। क्योंकि वह दृढ़ता से विश्वास करता था कि अय्यूब खरा एवं सीधा था, यह कि वह परमेश्वर का भय मानता और बुराई से दूर रहता था। परमेश्वर ने बस शैतान को अनुमति दी थी कि वह उसके सामने अय्यूब की धार्मिकता को परखे, और अपनी स्वयं की दुष्टता एवं घिनौनेपन को प्रकट करे। इसके अतिरिक्त, यह अय्यूब के लिए एक अवसर था कि वह अपनी धार्मिकता एवं परमेश्वर के प्रति अपने भय और बुराई से दूर रहने की गवाही को संसार के लोगों, शैतान, और यहाँ तक कि उन लोगों के सामने दे जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। क्या अंतिम परिणाम ने यह साबित किया कि अय्यूब के विषय में परमेश्वर का आंकलन सही एवं त्रुटिहीन था। क्या अय्यूब ने वास्तव में शैतान पर विजय प्राप्त किया था? हम यहाँ पर आदर्श वचनों को पढ़ते हैं जिन्हें अय्यूब के द्वारा बोला गया था, ऐसे वचन जो इस बात का प्रमाण हैं कि उसने शैतान पर विजय पा लिया था। उसने कहा, "मैं अपनी माँ के पेट से नंगा निकला और वहीं नंगा लौट जाऊँगा।" यह परमेश्वर के प्रति अय्यूब की आज्ञाकारिता की मनोवृत्ति है।

26 अक्टू॰ 2018

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग तीन

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III भाग तीन


आगे हम अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु के द्वारा बोले गए दृष्टान्त पर नज़र डालेंगे।
3. खोई हुई भेड़ का दृष्टान्त
(मत्ती18:12-14) क्या तुम समझते हो? यदि किसी मनुष्य की सौ भेड़ें हों, और उनमें से एक भटक जाए, तो क्या वह निन्यानवे को छोड़कर, और पहाड़ों पर जाकर, उस भटकी हुई को ना ढूँढ़ेगा? और यदि ऐसा हो कि उसे पाए, तो मैं तुम से सच कहता हूँ, कि वह उन निन्यानवे भेडों के लिए जो भटकी नहीं थी, इतना आनन्द नहीं करेगा जितना कि इस भेड़ के लिए करेगा। ऐसा ही तुम्हारे पिता की जो स्वर्ग में है यह इच्छा नहीं कि इन छोटों में से एक भी नष्ट हो।
यह एक रूपक है—इस अंश से लोग किस प्रकार का एहसास प्राप्त करते हैं? जिस तरह से इस अलंकार को प्रदर्शित किया गया है वह मानवीय भाषा में वाक्य अलंकार का उपयोग करता है; यह कुछ ऐसा है जो मनुष्य के ज्ञान के दायरे के भीतर है। यदि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में ऐसा कुछ कहा होता, तो लोगों ने महसूस किया होता कि वास्तव में जो परमेश्वर है यह उस के अनुरूप नहीं था, लेकिन जब मनुष्य के पुत्र ने अनुग्रह के युग में इस अंश को प्रदान किया, तब इससे लोगों को सुकून, उत्साह, और घनिष्ठता मिली। जब परमेश्वर देहधारी हुआ, जब वह एक मनुष्य के रूप में प्रकट हुआ, तो उसने मानवता पर अपने हृदय की आवाज़ को प्रकट करने के लिए बिल्कुल उचित रूपक का उपयोग किया। यह आवाज़ परमेश्वर के स्वयं की आवाज़ का और उस कार्य का प्रतिनिधित्व करता है जो वह उस युग में करना चाहता था। अनुग्रह के युग के लोगों के प्रति परमेश्वर का जो रवैय्या था यह उसे भी दर्शाता था। लोगों के प्रति परमेश्वर की मनोदृष्टि के नज़रिए से देखने से पता चलता है कि, उसने हर व्यक्ति की तुलना एक भेड़ से की है। यदि एक भेड़ खो जाती है, तो उसे खोजने के लिए जो कुछ हो सकता है वह करेगा। यह इस समय मनुष्यों के बीच परमेश्वर के कार्य के सिद्धांत को देह में दर्शाता है।

24 अक्टू॰ 2018

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I भाग एक

परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I भाग एक


आज हम एक महत्वपूर्ण विषय पर बातचीत कर रहे हैं। यह ऐसा विषय है जिस पर परमेश्वर के कार्य की शुरुआत से लेकर अब तक चर्चा की गई है, और यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए अत्याधिक महत्व रखता है। दूसरे शब्दों में, यह ऐसा विषय है, जिसके सम्पर्क में प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर में अपने विश्वास की प्रक्रिया के दौरान आएगा और ऐसा विषय है जिसे स्पर्श किया जाना चाहिए। यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण, एवं अनिवार्य विषय है जिसे मानवजाति खुद से अलग नहीं कर सकती है। इसके महत्व के बारे में कहें, तो परमेश्वर में प्रत्येक विश्वासी के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण बात क्या है? कुछ लोग सोचते हैं कि परमेश्वर की इच्छा को समझना अति महत्वपूर्ण बात है; कुछ लोग विश्वास करते हैं कि यह अति महत्वपूर्ण है कि परमेश्वर के और अधिक वचनों को खाया एवं पीया जाए; कुछ महसूस करते हैं कि अति महत्वपूर्ण बात यह है कि स्वयं को जाना जाए; अन्य लोग ऐसी राय के हैं कि अति महत्वपूर्ण बात यह जानना है कि किस प्रकार परमेश्वर के माध्यम से उद्धार की खोज की जाए, कि किस प्रकार परमेश्वर का अनुसरण किया जाए, और किस प्रकार परमेश्वर की इच्छा को पूरा किया जाए। हम आज के लिए इन सभी विषयों को एक तरफ रखेंगे। तो हम क्या बातचीत कर रहे हैं? हम परमेश्वर के बारे में एक विषय पर बातचीत कर रहे हैं। क्या यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण विषय है? परमेश्वर के बारे में किसी विषय की विषयवस्तु क्या है? हाँ वास्तव में, इस विषय को परमेश्वर के स्वभाव, परमेश्वर के सार एवं परमेश्वर के कार्य से अलग नहीं किया जा सकता है। अतः आज, आइए हम "परमेश्वर के कार्य, परमेश्वर के स्वभाव एवं स्वयं परमेश्वर" के बारे में चर्चा करें।

20 अक्टू॰ 2018

परमेश्वर को बेहतर जान सकते हैं लोग वचनों के कार्य के ज़रिये

  • परमेश्वर के वचनों का एक भजन
  • परमेश्वर को बेहतर जान सकते हैं लोग वचनों के कार्य के ज़रिये
  •  
  • I
  • अंत के दिनों का परमेश्वर मुख्यतः
  • प्रयोग करता है वचन पूर्ण करने के लिए इंसान को,
  • न कि संकेतों या चमत्कारों का, उसे दबाने या मनाने के लिए,
  • क्योंकि ज्ञात नहीं होती इनसे सामर्थ्य परमेश्वर की।
  • अगर परमेश्वर दिखाता संकेत और चमत्कार केवल,
  • तो नामुमकिन होता समझाना परमेश्वर की वास्तविकता को।
  • और नामुमकिन होता इस तरह पूर्ण करना इंसान को।
  • परमेश्वर पूर्ण नहीं करता इंसान को संकेतों या चमत्कारों से,
  • बल्कि सींचता है, चरवाही करता है वचनों से,
  • ताकि इंसान आज्ञाकारी बन सके, परमेश्वर को जान सके।

18 अक्टू॰ 2018

तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है

तुम्हें पता होना चाहिए कि व्यावहारिक परमेश्वर ही स्वयं परमेश्वर है

तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में क्या पता होना चाहिए? आत्मा, शरीर और वचन मिलकर ही स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर को बनाते हैं; और यही स्वयं व्यावहारिक परमेश्वर का वास्तविक अर्थ है। यदि तू सिर्फ़ शरीर के बारे में जानता है, यदि तू उसकी आदतों, और उसके चरित्र के बारे में जानता है, लेकिन तू आत्मा के कार्य या देह में आत्मा के कार्य के बारे में कुछ नहीं जानता है, और सिर्फ़ आत्मा और वचन पर ध्यान देता है, और केवल आत्मा के सामने प्रार्थना करता है, व्यावहारिक परमेश्वर में परमेश्वर के आत्मा के कार्य के बारे में कुछ भी जाने बिना, तब भी यह साबित करता है कि तुझे व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में कुछ भी ज्ञान नहीं है। व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में ज्ञान में उनके वचनों को जानना और अनुभव करना, और उन नियमों और सिद्धांतों को समझना जिनके द्वारा पवित्र आत्मा कार्य करता है, और परमेश्वर की आत्मा द्वारा देह में कार्य करने के तरीके को समझना शामिल है। इसी तरह, इसमें यह जानना भी शामिल है कि देह में परमेश्वर का हर कार्य आत्मा के द्वारा निर्देशित होता है, और कि उसके द्वारा बोले गए वचन आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। इसलिये, यदि तू व्यावहारिक परमेश्वर को जानना चाहता है, तो तुझे मुख्य रूप से यह जानना है कि परमेश्वर कैसे अपनी मानवीयता में, और अपनी ईश्वरीयता में कार्य करता है; यह सम्बन्ध रखता है आत्मा कि अभिव्यक्ति से, जिससे सभी लोगों का जुड़ाव है।

1 अक्टू॰ 2018

परमेश्वर स्वर्ग में है और धरती पर भी

  • परमेश्वर स्वर्ग में है और धरती पर भी


  •  
  • I
  • परमेश्वर, परमेश्वर।
  • परमेश्वर जब धरती पर होता है,
  • तो इंसानों के दिल में वो व्यवहारिक होता है।
  • स्वर्ग में वो सब जीवों का स्वामी होता है।
  • नदियाँ लांघी, पर्वत पर भी एकबार चढ़ा है परमेश्वर।
  • इंसानों के बीच कभी घूमा-फिरा है परमेश्वर।
  • स्वयं व्यवहारिक परमेश्वर का खुले-आम विरोध करे, किसमें साहस?

25 सित॰ 2018

मेरे दिल में हो तुम

  • आराधना गीत
  • मेरे दिल में हो तुम

  •  
  • I
  • घर से दूर जब निभाता हूँ फर्ज़ अपना मैं,
  • तो आता है ख़्याल तुम्हारा, करता हूँ प्रार्थना तुमसे मैं।
  • पढ़कर वचन तुम्हारे,
  • यकीन तुम पर बढ़ा है मेरा, और सुकून मिला है दिल को मेरे।
  • गवाही देने की ख़ातिर तुम्हारी, दर्द बहुत सहता हूँ मैं,
  • कितने प्यारे हो तुम, और बेहतर ढंग से जान पाया हूँ मैं।
  • अनुसरण करके तुम्हारा, अंत तक चलता रहूँगा मैं।
  • जब बदलोगे रूप अपना तुम,
  • तुम्हारी वापसी की अगवानी करेंगे हम,
  • तुम्हारी वापसी की अगवानी करेंगे हम।

17 सित॰ 2018

केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है भाग दो

केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है भाग दो


मनुष्य के भीतर परमेश्वर के द्वारा किए जाने वाले प्रत्येक कार्य के चरण में, बाहर से यह लोगों के मध्य परस्पर क्रिया के समान प्रतीत होता है, जैसे कि यह मानव प्रबंधों के द्वारा उत्पन्न हुआ हो, या मानविक हस्तक्षेप के माध्यम से। परन्तु पर्दे के पीछे, कार्य का प्रत्येक चरण, और घटित होने वाला सब कुछ, शैतान के द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई बाज़ी होती है और परमेश्वर के लिए एक दृढ़ गवाह बने रहने के लिए लोगों से अपेक्षा की जाती है। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब की परीक्षा ली जा रही थी: पर्दे के पीछे, शैतान परमेश्वर के सामने शर्त लगा रहा था, और अय्यूब के साथ जो हुआ वह मनुष्यों के कार्य थे, और मनुष्यों का हस्तक्षेप था। हर कदम के पीछे जो परमेश्वर ने शैतान के साथ बाज़ी में परमेश्वर ने तेरे लिए उठाए—उन सभी के पीछे एक युद्ध था। उदाहरण के लिए, यदि तू अपने भाइयों और बहनों के प्रति पक्षपातपूर्ण भावना रखता है, तो तेरे पास वे शब्द होंगे जो तू कहना चाहता है—वे शब्द जो परमेश्वर को अप्रसन्न करने वाले हो सकते हैं—परन्तु यह तेरे लिए भीतरी तौर पर कठिन होगा, और इस क्षण में, तेरे भीतर एक युद्ध आरंभ होगा: क्या मैं बोलूँ या नहीं? यही एक युद्ध है। इस प्रकार से, सभी बातों में एक युद्ध होता है, और जब तेरे भीतर एक युद्ध चल रहा हो, तो भला हो तेरे वास्तविक सहयोग और पीड़ा का, परमेश्वर तेरे भीतर कार्य करता है। अंत में, अंदर तू मामले को एक तरफ रख पाता है और क्रोध स्वाभाविक रूप से समाप्त हो जाता है। परमेश्वर के साथ तेरे सहयोग का यही प्रभाव होता है। हर एक चीज़ जो तू करता है उसके प्रयासों के लिए तुझे एक कीमत चुकानी होती है। बिना वास्तविक कठिनाई के, तू परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर सकता है, यह परमेश्वर को संतुष्ट करने के कुछ करीब तक भी नहीं पहुंचता है, और तुम केवल खोखले नारे लगा रहे हो! क्या ये खोखली बातें परमेश्वर को संतुष्ट कर सकती है?

16 सित॰ 2018

केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है भाग एक

केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है भाग एक

आज, जैसे तुम लोग परमेश्वर को जानने और प्रेम करने की कोशिश करते हो, एक प्रकार से तुम लोगों को कठिनाई और परिष्करण से होकर जाना होगा और दूसरे में, तुम लोगों को एक मूल्य चुकाना होगा। परमेश्वर को प्रेम करने के सबक से ज्यादा कुछ भी गहरा सबक नहीं है और ऐसा कहा जा सकता है कि सबक जो मनुष्य जीवन भर विश्वास करने से सीखते हैं वह परमेश्वर को किस प्रकार से प्रेम करना होता है। अर्थात् यदि तू परमेश्वर पर विश्वास करता है तो तुझे उसे प्रेम करना होगा। यदि तू केवल परमेश्वर पर विश्वास करता है परन्तु उससे प्रेम नहीं करता है, परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं किया है, और कभी भी परमेश्वर को अपने हृदय से निकलने वाले सच्चे प्रेम से प्रेम नहीं किया है, तो परमेश्वर पर तेरा विश्वास करना व्यर्थ है; यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में, तू परमेश्वर से प्रेम नहीं करता है, तो तू व्यर्थ में ही जी रहा है, और तेरा सम्पूर्ण जीवन सभी जीवन से सबसे निम्न स्तर पर है। यदि, तूने अपने सम्पूर्ण जीवन भर में कभी भी परमेश्वर को प्रेम नहीं किया या संतुष्ट नहीं किया, तो तेरे जीने का क्या अर्थ रहा? और परमेश्वर पर तेरे विश्वास करने का क्या अर्थ हुआ?

13 सित॰ 2018

ईमानदार व्यक्ति होकर ख़ुश हूँ मैं

  • आराधना गीत
  • ईमानदार व्यक्ति होकर ख़ुश हूँ मैं

  •  
  • I
  • सत्य की समझ मेरी आत्मा को करती है मुक्त, देती है मुझे ख़ुशी।
  • बिना किसी संदेह, परमेश्वर के वचन में विश्वास से भरा हूँ मैं।
  • नकारात्मकता के बिना, पीछे नहीं लेता मैं कदम, निराश होता नहीं मैं।
  • दैहिक चिंताओं के बिना,
  • अपने कर्तव्यों को पूरा करने की करता हूँ पूरी कोशिश।

2 सित॰ 2018

परमेश्वर को प्रेम करने का पथ उजागर करता है सत्य और झूठ कोप्यार

  • आराधना गीत
  • परमेश्वर को प्रेम करने का पथ उजागर करता है सत्य और झूठ को
  •  
  • I
  • प्रेम करते हैं जो परमेश्वर को आज्ञापालन उसका वे करते हैं।
  • करुणा दिल उनका दिखाता, है दिखाता है।
  • जो नहीं करते प्रेम उसको, करते हैं विद्रोह ख़िलाफ़ उसके,
  • करते हैं प्रयास अपनी नियति के लिये,
  • बिना ज़मीर के, बिना ज़मीर के।
  • करते हैं प्रेम जो परमेश्वर को, धार्मिकता चाहते हैं,
  • प्यार सत्य को करते हैं वचन के अनुसार उसकेजीते हैं।
  • दिल होता है सच्चा, निष्ठावान पवित्र उनका।
  • त्याग नहीं सकते वो परमेश्वर को सदा के लिये।

1. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना क्या है? अगर कोई केवल प्रभु के लिए मिशनरी (धर्म-प्रचार सम्बन्धी) काम करता है, तो क्या यह परमेश्वर की इच्छा का पालन करना है?

XVIII. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण क्या है और परमेश्वर में विश्वास की सच्ची गवाही क्या है, इस पर हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाह...