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26 फ़र॰ 2018

परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है

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सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन
मानवजाति का सदस्य और सच्चे ईसाई होने के नाते, अपने मन और शरीर को परमेश्वर के आदेश को पूरा करने के लिए समर्पित करना हम सभी की ज़िम्मेदारी और दायित्व है, क्योंकि हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व परमेश्वर से आया है, और यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण अस्तित्व में है।

29 अक्टू॰ 2017

पाँचवाँ कथन

पाँचवाँ कथन

जब मेरा आत्मा आवाज देता है, तो यह मेरे सम्पूर्ण स्वभाव को व्यक्त करता है। क्या तुम लोग इस बारे में स्पष्ट हो? इस बिंदु पर अस्पष्ट होना प्रत्यक्षतः मेरा विरोध करने के बराबर होगा। क्या तुम लोगों ने इसमें निहित महत्व को वास्तव में देखा है? क्या तुम लोगों को सच में पता है कि मैं तुम पर कितना प्रयास, कितनी ऊर्जा, व्यय करता हूँ? क्या तुम लोगों ने मेरे सामने जो कुछ भी किया है उसे साफ-साफ कहने का तुम लोगों में वास्तव में साहस है? और तुम लोगों में मेरे सामने अपने आप को मेरे लोग कहने की धृष्टता है—तुम लोगों में जरा सा भी शर्म का बोध नहीं है, किसी तर्क-शक्ति की बात तो दूर है! कभी न कभी, इस तरह के लोग मेरे घर से निर्वासित कर दिए जाएँगे। मेरे साथ तुम पुराने सिपाही के जैसे मत आओ, यह सोचते हुए कि तुम ने मेरी गवाही दी थी! क्या यह कुछ ऐसा है जिसे मानवजाति करने में समर्थ है? यदि तुम्हारे अभिप्रायों और तुम्हारे लक्ष्यों का कुछ भी शेष नहीं रहा होता, तो तुम बहुत पहले ही किसी भिन्न रास्ते पर चले गए होते। क्या तुम्हें लगता है कि मुझे पता नहीं है कि मनुष्य का हृदय कितना सँभाल सकता है? अब से आगे, तुम्हें सभी बातों में अभ्यास की वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए; मात्र अपनी बकवास करने से, जैसे कि तुम किया करते थे, अब और काम नहीं चलेगा।

28 अक्टू॰ 2017

अनुभव पर

अनुभव पर

पतरस के सारे अनुभवों के दौरान, उसने सैकड़ों परीक्षाओं को सहन किया। हालांकि लोग अब परीक्षा शब्द के बारे में जानते हैं, लेकिन वे उसके सच्चे अर्थ या परिस्थितियों को बिल्कुल नहीं समझते हैं। परमेश्वर मनुष्य के संकल्प को बेहतर बनाता है, उसके आत्मविश्वास को परिष्कृत करता है, और उसके हर हिस्से को उत्तम बनाता है, और वो ज्यादातर इसे परीक्षाओं के माध्यम से हासिल करता है। परीक्षा, पवित्र आत्मा का छिपा कार्य भी है। ऐसा लगता है कि परमेश्वर ने मनुष्य को त्याग दिया है, और इसलिए, यदि मनुष्य सावधान न हो तो उन्हें शैतान के प्रलोभन के रूप में देखेगा। वास्तव में, कई परीक्षाओं को प्रलोभन माना जा सकता है, और यह परमेश्वर के काम का सिद्धांत और नियम है। यदि मनुष्य वास्तव में परमेश्वर के सामने रहता है, तो वह उन्हें परमेश्वर की परीक्षाओं के रूप में देखेगा और उनमें चूक नहीं करेगा। अगर कोई कहता है कि परमेश्वर उसके साथ है तो शैतान निश्चित रूप से उसके पास नहीं आएगा, तो यह पूरी तरह से सही नहीं है।

26 अक्टू॰ 2017

मार्ग … (4)

मार्ग … (4)

यह बात कि लोग परमेश्वर की सुंदरता की खोजने में, इस युग में परमेश्वर को प्यार करने का तरीका तलाश करने में सक्षम हैं, और यह कि वे आज के राज्य के प्रशिक्षण को स्वीकार करने के इच्छुक हैं-यह सब परमेश्वर का अनुग्रह है और इससे भी ज़्यादा, वही है जो मानव जाति का उत्थान कर रहा है। जब भी मैं इस बारे में सोचता हूँ, तो मुझे दृढ़ता से परमेश्वर की सुंदरता महसूस होती है। यह सच है कि परमेश्वर हमें प्यार करता है। अन्यथा, उसकी सुदरता को खोजने में कौन सक्षम हो सकेगा? यह केवल इस बात से है कि मैं देखता हूँ कि यह सब कार्य व्यक्तिगत रूप से स्वयं परमेश्वर के द्वारा किया जाता है, और लोगों को परमेश्वर द्वारा मार्गदर्शित और निर्देशित किया जाता है। मैं इसके लिए परमेश्वर का धन्यवाद देता हूँ, और मैं चाहूँगा कि मेरे भाई और मेरी बहनें परमेश्वर की स्तुति करने में मेरे साथ शामिल हों: “सभी महिमा आप, सर्वोच्च परमेश्वर स्वयं, तेरे के लिए हो! आपकी तेरी महिमा में वृद्धि हो और हममें से उन पर प्रकट हो जिन्हें आपकेतुम्हारे तेरे द्वारा चुना और प्राप्त कर लिया गया है।” मैंने परमेश्वर से प्रबुद्धता प्राप्त कर ली है-युगों से पहले परमेश्वर ने हमें पहले ही पूर्वनियत कर दिया था और अंत के दिनों में हमें प्राप्त करना चाहता था, इस प्रकार ब्रह्मांड में उपस्थित सभी को हमारे माध्यम से परमेश्वर की महिमा को इसकी संपूर्णता में देखने की अनुमति दी। इस प्रकार, हम परमेश्वर की छह हज़ार वर्षों की प्रबंधन योजना के एक निश्चित और स्पष्ट आकार हैं; हम समस्त ब्रह्मांड में परमेश्वर के कार्य के आदर्श हैं, नमूने हैं। अब जाकर मुझे पता लगा कि परमेश्वर का हमारे लिए वास्तव में कितना प्यार है, और यह कि वह हममें जो कार्य करता है और जो बातें वह कहता है वह सब बीते युगों की बातों से लाखों गुना अधिक हैं। यहाँ तक ​​कि इस्राएल में और पतरस में भी, परमेश्वर ने कभी भी इतना कार्य नहीं किया और इतनी बात नहीं की।

24 अक्टू॰ 2017

मार्ग... (2)

मार्ग... (2)

शायद हमारे भाइयों और बहनों के पास मुख्य भूमि चीन में परमेश्वर के काम के अनुक्रम, कदमों, और तरीकों की एक रूपरेखा है, लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि हमारे भाइयों और बहनों के लिए एक अनुस्मरण या थोड़े संक्षिप्त विवरण का होना बेहतर है। मेरे दिल में क्या है उसमें से थोड़ा सा कहने के लिए मैं सिर्फ़ इस अवसर का उपयोग कर रहा हूँ; मैं इस काम के बाहर किसी चीज के बारे में बात नहीं कर रहा हूँ। मुझे आशा है कि भाई और बहनें मेरी मनोदशा को समझ सकते हैं, और मैं विनम्रता से विनती भी करता हूँ कि जिन लोगों ने मेरे वचनों को पढ़ा है, वे मेरे छोटे डील-डौल को समझते और क्षमा कर देते हैं, कि मेरा जीवन अनुभव वास्तव में अपर्याप्त है, और यह कि मैं सच में परमेश्वर के सामने अपने सिर को ऊँचा नहीं रख सकता हूँ। हालाँकि, मुझे हमेशा लगता है कि ये केवल वस्तुनिष्ठ कारण हैं। संक्षेप में, कुछ भी हो, कोई भी लोग, घटनाएँ या चीजें परमेश्वर की उपस्थिति में हमारी संगति को बाधित नहीं कर सकती हैं, और मुझे आशा है कि हमारे भाई और बहनें मेरे साथ परमेश्वर के सामने अधिक कठिन काम करने में सक्षम हैं। मैं निम्नलिखित प्रार्थना समर्पित करना चाहूँगा: “हे परमेश्वर! कृपया हम पर दया करो ताकि मैं और मेरे भाई और बहनें हमारे सामान्य आदर्शों के प्रभुत्व के अधीन मिलकर संघर्ष कर सकें, मृत्यु तक तेरे प्रति वफादार रह सकें, और इस का कभी उल्लंघन न करें!” ये वचन वह दृढ़ संकल्प है जिसे मैंने परमेश्वर के सामने निर्धारित किया है, लेकिन यह भी कहा जा सकता है कि यह शरीरधारी एक आदमी, जिसे परमेश्वर के द्वारा उपयोग किया जाता है, के रूप में मेरा अपना आदर्श वाक्य है। मैंने इसे कई बार अपनी तरफ से भाइयों और बहनों के साथ संगति में साझा किया है, और मैंने इसे अपने आसपास के लोगों को एक संदेश के रूप में दिया है। मुझे नहीं पता कि लोग इसके बारे में क्या सोचते हैं, लेकिन कुछ भी हो, मुझे विश्वास है कि उनके पास न केवल व्यक्तिपरक प्रयास का एक पहलू है, बल्कि इससे भी ज्यादा, उनमें वस्तुनिष्ठ परिकल्पना का एक पहलू भी समाविष्ट है।

18 अक्टू॰ 2017

एक सामान्य अवस्था में प्रवेश कैसे करें

एक सामान्य अवस्था में प्रवेश कैसे करें

परमेश्वर के वचनों के प्रति लोग जितने अधिक ग्रहणशील होते हैं, वे उतने ही अधिक प्रबुद्ध हो जाते हैं और परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करने के लिए उन्हें उतनी ही अधिक भूख और प्यास होती है। केवल उनको जो परमेश्वर के वचनों को पाते हैं, अधिक गहरे और समृद्ध अनुभव प्राप्त होते हैं; केवल वे ही हैं जिनके जीवन अधिक से अधिक फलते-फूलते हैं। हर कोई जो जीवन का अनुसरण करता है, उन सब को इसे ऐसे मानना चाहिए जैसे कि यह उनका अपना काम हो, और उनकी यह भावना होनी चाहिए कि वे परमेश्वर के बिना नहीं रह सकते, परमेश्वर के बिना एक भी सफलता नहीं है, और परमेश्वर के बिना सब शून्य है। उन्हें पवित्र आत्मा की उपस्थिति के बिना कुछ भी न करने का, और आगे ऐसा कुछ भी करने के लिए अनिच्छुक होने का संकल्प करना चाहिए, यदि उनके कार्य फल न दें। उन्हें लिप्त नहीं होना चाहिए। जीवन के अनुभव परमेश्वर के ज्ञान और मार्गदर्शन के माध्यम से आते हैं, और वे तुम सब के व्यक्तिपरक प्रयासों का फल भी हैं। तुम सभी के पास अपने जीवन के अनुभव में अपने लिए बहाने न करने की आवश्यकता होनी चाहिए।

17 अक्टू॰ 2017

परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है

परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना बहुत महत्वपूर्ण है

तहेदिल से परमेश्वर की आत्मा को स्पर्श करके लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उससे प्रेम करते हैं, और उसे संतुष्ट करते हैं, और इस प्रकार वे परमेश्वर की संतुष्टि प्राप्त करते हैं; जब वे तहेदिल से परमात्मा के शब्दों को समझते हैं, तो परमेश्वर की आत्मा का उन पर भावनात्मक प्रभाव पड़ता है। यदि तुम एक उचित आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करना चाहते हो और परमेश्वर के साथ एक उचित संबंध स्थापित करना चाहते हैं, तो तुमको पहले उसे अपना हृदय अर्पित करना होगा, और अपने हृदय को उनके सामने शांत करना होगा। अपने पूरे हृदय को परमेश्वर की स्तुति में डुबोकर ही तुम धीरे-धीरे एक उचित आध्यात्मिक जीवन का विकास कर सकते हो। यदि लोग परमेश्वर को अपना हृदय अर्पित नहीं करते हैं और उस पर पूरी तरह विश्वास नहीं करते हैं, और अगर उनका दिल उन्हें महसूस नहीं करता है और वे परमेश्वर के बोझ को अपना बोझ नहीं मानते हैं, तो जो कुछ भी वो कर रहे हैं उससे केवल परमेश्वर को धोखा दे रहे हैं, और ये धार्मिक व्यक्तियों का केवल व्यवहार है—ये परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त नहीं कर सकता है। इस तरह के व्यक्ति से परमेश्वर को कुछ नहीं मिल सकता; इस तरह का व्यक्ति परमेश्वर के काम के पथ में केवल एक विषमता है, परमेश्वर के घर में सजावट के किसी सामान की तरह, जगह लेता हुआ, और बेकार—परमेश्वर के लिए इस तरह का व्यक्ति उपयोगी नहीं है। ऐसे व्यक्ति में, पवित्र आत्मा के काम के लिए कोई अवसर नहीं है, और इससे भी ज़्यादा, ऐसे व्यक्ति में पूर्णता का कोई महत्व नहीं है। ऐसा व्यक्ति एक चलते-फिरते मृत व्यक्ति की तरह है। ऐसे व्यक्ति के भीतर ऐसा कोई भी अंश नहीं बचा है जिसका उपयोग पवित्र आत्मा कर सके—उन सभी का उपयोग शैतान द्वारा किया जा चुका है, उन्हें पूरी तरह शैतान ने दूषित कर दिया है, और उन्हें हटाना परमेश्वर का उद्देश्य है।

12 अक्टू॰ 2017

जो सचमुच में आज्ञाकारी हैं वे निश्चय ही परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे

जो सचमुच में आज्ञाकारी हैं वे निश्चय ही परमेश्वर के द्वारा ग्रहण किए जाएँगे

पवित्र आत्मा का काम दिन ब दिन बदलता जाता है, हर एक कदम के साथ ऊँचा उठता जाता है; आने वाले कल का प्रकाशन आज से भी कहीं ज़्यादा ऊँचा हो जाता है, कदम दर कदम और ऊपर चढ़ता जाता है। जिस कार्य के द्वारा परमेश्वर मनुष्य मनुष्य को सिद्ध करता है वह ऐसा ही है। यदि मनुष्य उस गति से चल न पाए, तो उसे किसी भी समय छोड़ा जा सकता है। यदि मनुष्य के पास आज्ञाकारी हृदय न हो, तो वह अंत तक अनुसरण नहीं कर सकता है। पुराना युग गुज़र गया है; अब एक नया युग है। और नए युग में, नया कार्य करना होगा। विशेषकर अंतिम युग में जहाँ मनुष्य को सिद्ध किया जाएगा, परमेश्वर पहले से ज़्यादा तेजी से नया काम करेगा। इसलिए, अपने हृदय में आज्ञाकारिता को धारण किए बिना, मनुष्य के लिए परमेश्वर के कदमों के निशानों के पीछे पीछे चलना कठिन होगा। परमेश्वर नियमों में बना नहीं रहता है, न ही वह अपने कार्य के किसी स्तर को अपरिवर्तनीय मानता है। बल्कि, परमेश्वर के द्वारा किया गया कार्य हमेशा नया और हमेशा ऊँचा होता है। उसका कार्य हर एक कदम के साथ और भी अधिक व्यावहारिक होता जाता है, और मनुष्य की वास्तविक जरूरतों के और भी अधिक अनुरूप होता जाता है। जब मनुष्य इस प्रकार के कार्य का अनुभव करता है केवल तब ही वह अपने स्वभाव के अंतिम रूपान्तरण को हासिल कर पाता है। जीवन के विषय में मनुष्य का ज्ञान और अधिक ऊँचा होता जाता है, इसलिए परमेश्वर का काम भी और अधिक ऊँचा होता जाता है।

11 अक्टू॰ 2017

छुटकारे के युग में कार्य से सम्बन्धित सत्य

छुटकारे के युग में कार्य से सम्बन्धित सत्य

मेरी सम्पूर्ण प्रबन्धन योजना, जो छः हज़ार सालों तक फैली हुई है, तीन चरणों या तीन युगों को शामिल करती हैः पहला, व्यवस्था का युग; दूसरा, अनुग्रह का युग (जो छुटकारे का युग भी है); और अंत में राज्य का युग। प्रत्येक युग की प्रकृति के अनुसार मेरा कार्य इन तीनों युगों में अलग-अलग है, परन्तु प्रत्येक अवस्था में यह मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप है - या बल्कि, यह उन छलकपटों के अनुसार बदलता है जो शैतान मुझ से युद्ध करने के लिए काम में लाता है। मेरे कार्य का उद्धेश्य शैतान को हराना है, मेरी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को प्रदर्शित करना, शैतान के सभी छलकपटों को उजागर करना और उसके द्वारा समस्त मानवता को बचाना है, जो उसके अधिकार क्षेत्र के अधीन जीवन जीती है। यह मेरी बुद्धि और सर्व-शक्तिमानता को दिखाने के लिए है जबकि उसके साथ-साथ शैतान की भयानकता को प्रकट करने के लिए है। इसके अतिरिक्त, यह मेरी रचनाओं को अच्छे और बुरे के बीच में अन्तर करना सिखाने के लिए है, यह पहचानना सिखाने के लिए है कि मैं सभी चीज़ों का शासक हूँ, यह देखना सिखाने के लिए है कि शैतान मानवता का दुश्मन है, और अधम से भी अधम है, दुष्ट है, और अच्छे एवं बुरे, सत्य एवं झूठ, पवित्रता एवं गन्दगी, महानता एवं नीचता के बीच दिन के समान स्पष्ट अंतर करना सिखाने के लिए है।

10 अक्टू॰ 2017

व्यवस्था के युग में कार्य

व्यवस्था के युग में कार्य

वह कार्य जो यहोवा ने इस्राएलियों में किया, उसने पृथ्वी पर परमेश्वर के मूल स्थान, उसके पवित्र स्थान को स्थापित किया जहाँ वह उपस्थित था। उसने अपने कार्य को इस्राली लोगों तक ही सीमित रखा। आरम्भ में, उसने इस्राएल के बाहर काम नहीं किया; उसके बजाए, उसने ऐसे लोगों को चुना जिन्हें उसने अपने कार्यक्षेत्र को सीमित रखने के लिए उचित पाया। इस्राएल वह जगह है जहाँ परमेश्वर ने आदम और हव्वा की रचना की, और उस जगह की धूल से यहोवा ने मनुष्य को बनाया; यह पृथ्वी पर उसके कार्य का आधार था। इस्राएली, जो नूह और आदम के वंशज हैं, पृथ्वी पर यहोवा के कार्य की बुनियाद थे।

8 अक्टू॰ 2017

जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं

जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं केवल वे ही परमेश्वर को सन्तुष्ट कर सकते हैं

देहधारी परमेश्वर के कार्य में दो भाग शामिल हैं। जब सबसे पहली बार उसने देह धारण किया, तो लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया या उसे नहीं पहचाना, और यीशु को क्रूस पर ठोंक दिया। दूसरी बार भी लोगों ने उस पर विश्वास नहीं किया, उसे बहुत कम पहचाना, और एक बार फिर से यीशु को क्रूस पर ठोंक दिया। क्या मनुष्य परमेश्वर का बैरी नहीं हैं? यदि मनुष्य उसे नहीं जानता है, तो वह परमेश्वर का अंतरंग कैसे हो सकता है? और वह कैसे परमेश्वर की गवाही देने के योग्य हो सकता है? परमेश्वर को प्यार करना, परमेश्वर की सेवा करना, महिमा बढ़ाना - क्या ये कपटपूर्ण झूठ नहीं हैं? यदि आप अपने जीवन को इन अवास्तविक, अव्यवहारिक बातों के प्रति समर्पित करते हैं, तो क्या आप व्यर्थ में श्रम नहीं करते हैं? जब आप परमेश्वर को जानते तक नहीं हैं तो आप परमेश्वर के अंतरंग कैसे हो सकते हैं? क्या इस प्रकार की खोज अज्ञात और काल्पनिक नहीं है? क्या यह कपटपूर्ण नहीं हैं? कोई परमेश्वर का अंतरंग कैसे हो सकता है? परमेश्वर का अंतरंग होने का व्यवहारिक महत्व क्या है? क्या आप परमेश्वर के आत्मा के अंतरंग हो सकते हैं? क्या आप देख सकते हैं कि पवित्रात्मा कितना महान और उच्च है? किसी अदृश्य, अमूर्त परमेश्वर का अंतरंग होना - क्या यह अज्ञात और काल्पनिक नहीं है? इस प्रकार की खोज का व्यावहारिक महत्व क्या है? क्या ये सभी कपटपूर्ण झूठ नहीं हैं? आप जिस चीज की खोज करते हैं वह है परमेश्वर का अंतरंग बनना, फिर भी वास्तव में आप शैतान के छोटे से पालतू कुत्ते हैं, क्योंकि आप परमेश्वर को नहीं जानते हैं और अस्तित्वहीन “सभी चीजों के परमेश्वर” की खोज करते हैं, जो कि अदृश्य, अमूर्त और आपकी अपनी धारणाओं का है। अस्पष्टता से कहा जाए, तो इस प्रकार का “परमेश्वर” शैतान है, और व्यावहारिक रूप से कहा जाए तो यह आप स्वयं हैं।

7 अक्टू॰ 2017

सत्य का अभ्यास कीजिए जब एक बार आप लोग उसे समझ जाते हैं

सत्य का अभ्यास कीजिए जब एक बार आप लोग उसे समझ जाते हैं

परमेश्वर के कार्य और वचन का अभिप्राय आप लोगों के स्वभाव में एक परिवर्तन लाना है; उनका उद्देश्य मात्र यह नहीं है कि आप लोग उन्हें समझें या पहचानें और उन्हें अंत तक रखे रहें। उस व्यक्ति के समान जिसके पास प्राप्त करने की योग्यता है। आप लोगों को परमेश्वर के वचन को समझने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर के अधिकतर वचन मानवीय भाषा में लिखे गए हैं जो समझने में बहुत आसान हैं। उदाहरण के लिए, आप लोग जान सकते हैं जो परमेश्वर आपसे चाहते हैं कि आप उसे समझें और उसका अभ्यास करें; यह कुछ ऐसा है जिसे एक उचित व्यक्ति, जिसके पास समझने की क्षमता है, के करने योग्य होना चाहिए। परमेश्वर अब जो कहते हैं वह विशेष रूप से स्पष्ट और पारदर्शी है, और परमेश्वर बहुत सी चीज़ों, जिस पर लोगों ने विचार नहीं किया है, या मनुष्य की विभिन्न परिस्थितियों की ओर संकेत करते हैं। उसके वचन सभी के द्वारा स्वीकार किये जाते हैं। पूर्ण चाँद की रोशनी के समान साफ साफ। इसलिए अब, लोग बहुत से मामलों को समझते हैं। उनमें बस उसके वचन का अभ्यास करने की कमी है। लोगों को विस्तार से सत्य के सभी पहलुओं का अनुभव करना होगा, और अधिक विस्तार से उसकी छानबीन एवं खोज करनी होगी। बस यों ही उसे लेने का इन्तजार नहीं करना है जो उन्हें तत्परता से दिया जाता है; अन्यथा वे बेगारों से कुछ बढ़कर ही रह जाते हैं। वे परमेश्वर के वचन को जानते हैं, किन्तु उसे अभ्यास में नहीं लाते हैं।

6 अक्टू॰ 2017

दुष्ट को दण्ड अवश्य दिया जाना चाहिए

दुष्ट को दण्ड अवश्य दिया जाना चाहिए

इस बात का निरीक्षण करना कि क्या तुम जो कुछ भी करते हैं उसमें धार्मिकता का अभ्यास करते हैं, और क्या तुम्हारी समस्त क्रियाओं की परमेश्वर द्वारा निगरानी की जाती है, ये परमेश्वर में विश्वास करनेवालों के स्वभावजन्य सिद्धांत हैं। तुम लोग धर्मी कहलाओगे क्योंकि तुम लोग परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम हो, और क्योंकि तुम लोग परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा को स्वीकार करते हो। परमेश्वर की नज़र में, वे सब जो परमेश्वर की देखभाल, सुरक्षा और पूर्णता को स्वीकार करते हैं और जो उसके द्वारा प्राप्त कर लिए जाते हैं, वे धर्मी हैं और परमेश्वर द्वारा प्यार से देखे जाते हैं। तुम लोग अभी इसी समय परमेश्वर के वचनों को जितना अधिक स्वीकार करते हो, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर की इच्छा को प्राप्त करने और समझने में सक्षम हो जाते हो, और इस प्रकार तुम उतना ही अधिक परमेश्वर के वचनों को जी सकते हो और उसकी अपेक्षाओं को संतुष्ट कर सकते हो। यह तुम लोगों के लिए परमेश्वर का आदेश है, और वह है जिसे तुम लोगों को प्राप्त करना चाहिए।

5 अक्टू॰ 2017

परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है

परमेश्वर के वचन के द्वारा सब कुछ प्राप्त हो जाता है

परमेश्वर भिन्न-भिन्न युगों के अनुसार अपने वचन कहता है और अपना कार्य करता है, तथा भिन्न-भिन्न युगों में, वह भिन्न-भिन्न वचन कहता है। परमेश्वर नियमों से नहीं बँधता है, और एक ही कार्य को दोहराता नहीं है, और न अतीत की बातों को लेकर विषाद करता है; वह ऐसा परमेश्वर है जो सदैव नया है, कभी पुराना नहीं होता है, और वह हर दिन नये वचन बोलता है। जिस चीज का आज पालन किया जाना चाहिए उसका तुम्हें पालन करना चाहिए; यही मनुष्य की जिम्मेवारी और कर्तव्य है। यह अत्यंत महत्वपूर्ण है कि अभ्यास परमेश्वर की वर्तमान रोशनी और वास्तविक वचनों के आस-पास केन्द्रित हो। परमेश्वर नियमों का पालन नहीं करता है, और अपनी बुद्धि और सर्व-सामर्थ्य को प्रकट करने के लिए विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलने में सक्षम है। यह मायने नहीं रखता है कि वह आत्मा के परिप्रेक्ष्य से बोलता है, या मनुष्य के, या फिर किसी तीसरे व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से बोलता है—परमेश्वर सदैव परमेश्वर है, उसके मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से बोलने की वजह से तुम यह नहीं कह सकते कि वह परमेश्वर नहीं है। परमेश्वर के विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलने के फलस्वरूप कुछ लोगों में कुछ धारणाएँ उभर आयी हैं। ऐसे लोगों में परमेश्वर का ज्ञान नहीं है और उसके कार्य का ज्ञान नहीं है। यदि परमेश्वर सदैव किसी एक ही परिप्रेक्ष्य से बोलता, तो क्या मनुष्य परमेश्वर के लिए भी कुछ नियम निर्धारित नहीं कर देता? क्या परमेश्वर मनुष्यों को इस तरह से कार्य करने की अनुमति दे सकता था? इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर किस परिप्रेक्ष्य से बोलता है, प्रत्येक के लिए परमेश्वर का अपना लक्ष्य है। यदि परमेश्वर ने सदैव आत्मा की दृष्टि से बोला होता, तो क्या तुम उसके साथ जुड़ने में सक्षम होते? इसलिए, तुम्हें अपने वचन प्रदान करने और वास्तविकता में तुम्हारा मार्गदर्शन करने के लिए वह तीसरे व्यक्ति के रूप में बोलता है। परमेश्वर जो कुछ भी करता है, उपयुक्त होता है। संक्षेप में, यह सब कुछ परमेश्वर द्वारा किया जाता है और तुम्हें इस बारे में जरा भी संदेह नहीं करना चाहिये। बशर्ते कि वह परमेश्वर है, तब इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता है कि वह किस परिप्रेक्ष्य से बोलता है, वह तब भी परमेश्वर ही है। यह एक अडिग सत्य है।

3 अक्टू॰ 2017

एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के सम्बन्ध में

एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के सम्बन्ध में

एक विश्वासी के पास एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन होना ही चाहिए- यह परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने और वास्तविकता में प्रवेश करने का आधार है। वर्तमान समय में, सभी प्रार्थनाएं, परमेश्वर के करीब आना, गायन, स्तुति करना, ध्यान, और परमेश्वर के वचनों को समझने की कोशिश का जो अभ्यास आप लोग कर रहे हैं, क्या वह एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन के मानकों पर खरा उतरता है? आप लोगों में से कोई भी इस बारे में बहुत स्पष्ट नहीं है। एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन, प्रार्थना, गीत, कलीसिया का जीवन, परमेश्वर के वचनों का खान-पान और दूसरे ऐसे ही अभ्यासों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मतलब है, एक निर्मल और जीवंत आध्यात्मिक जीवन जीना। यह तरीके के बारे में नहीं, बल्कि नतीजे से सम्बन्धित है। ज्यादातर लोग सोचते हैं कि एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन पाने के लिए उन्हें प्रार्थना, गाना, परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना, या परमेश्वर के शब्दों को समझने की कोशिश करनी चाहिए। कोई परिणाम मिले या ना मिले, या चाहे सही समझ हो या ना हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता, ये लोग बस बाहर की गतिविधियों से होकर गुज़रने पर ध्यान लगाते हैं, और नतीजे पर उनका ध्यान नहीं होता-वे धर्म के अनुष्ठानों में रहने वाले लोग हैं, कलीसिया के भीतर रहने वाले लोग नहीं, और उनका राज्य की प्रजा होने का संयोग तो और भी कम है।

1 अक्टू॰ 2017

वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं

वे सब जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे ही परमेश्वर का विरोध करते हैं


परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य, मनुष्यों में कैसा प्रभाव प्राप्त किया जाना है, और मनुष्य के प्रति परमेश्वर की इच्छा क्या है, को समझना यही सब बातें हर उस व्यक्ति को उपार्जित करनी चाहिये जो परमेश्वर का अनुसरण करता है। अभी सभी मनुष्यों में जिस चीज का अभाव है, वह है परमेश्वर के कार्य का ज्ञान। मनुष्य न बूझता है और न समझता है कि वास्तव में कौन सी चीज मनुष्य में परमेश्वर के कर्म, परमेश्वर के समस्त कार्य को, और सृष्टि की रचना के बाद से परमेश्वर की इच्छा, को निर्मित करती है। यह अपर्याप्तता न केवल समस्त धार्मिक जगत में देखी जाती है है, बल्कि इसके अलावा परमेश्वर के सभी विश्वासियों में भी देखी जाती है। जब वह दिन आता है कि आप वास्तव में परमेश्वर को देखते हैं और उसकी बुद्धि को समझते हैं; जब आप परमेश्वर के सब कर्मों को देखते हैं, और पहचानते हैं कि परमेश्वर क्या हैं और उसके पास क्या है; जब आप उसकी विपुलता, बुद्धि, चमत्कार, और मनुष्य में उसके समस्त कार्य को निहारते हैं, तब उस दिन होगा कि आपने परमेश्वर में सफल विश्वास को प्राप्त कर लिया होगा। जब परमेश्वर को सर्वव्यापी और अत्यधिक विपुल कहा जाता है, तब सर्वव्यापी से क्या अभिप्राय है? और विपुलता से क्या अभिप्राय है? यदि आप इस बात को नहीं समझते हैं, तो आप परमेश्वर के विश्वासी नहीं माने जा सकते हैं। मैं क्यों कहता हूँ कि धार्मिक जगत के वे लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते हैं और कुकर्मी हैं, जो उसी प्रकार के हैं जैसा शैतान है? जब मैं कहता हूँ कि वे कुकर्मी हैं, तो ऐसा इसलिये कहता हूँ क्योंकि वे परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते हैं अथवा उसकी बुद्धि को नही देखते हैं। परमेश्वर उन पर कभी भी अपने काम को प्रकट नहीं करता है; वे अंधे व्यक्ति हैं, वे परमेश्वर के कर्मों को नहीं देखते हैं। वे परमेश्वर द्वारा परित्यक्त हैं और उन्हें परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा बिल्कुल भी प्राप्त नहीं है, और पवित्र आत्मा का काम तो और भी कम प्राप्त है। वे जो परमेश्वर के काम के बिना हैं, वे कुकर्मी हैं और परमेश्वर के विरोध में खड़े हैं।

26 सित॰ 2017

परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है


परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है


जब आप रोते हुए इस संसार में आए, उस समय से लेकर आपने अपना कार्य करना प्रारम्भ कर दिया था। आप परमेश्वर की योजना और विधान में अपनी भूमिका को अपना लेते हैं। आपने अपने जीवन की यात्रा प्रारम्भ कर दी है। आपकी कैसी भी पृष्ठभूमि हो और आपके सामने कैसी भी यात्रा हो, स्वर्ग में रखी हुई योजनाओं और प्रबंधों से कोई भी बचकर नहीं भाग सकता और कोई भी अपने भाग्य का नियंत्रण नहीं कर सकता, क्योंकि जो सभी बातों पर शासन करता है वही केवल ऐसे कार्यों को करने के योग्य है। जब से मनुष्य अस्तित्व में आया, परमेश्वर अपने कार्य में लगा हुआ है, इस ब्रह्माण्ड का प्रबंधन करने और सभी बातों के परिवर्तन एवं संचालन में निर्देश देता है। सभी बातों की तरह, परमेश्वर से मनुष्य चुपचाप और अनजाने में मिठास, बारिश और ओस का पोषण प्राप्त करता है। सभी बातों के समान, मनुष्य अनजाने में परमेश्वर के हाथ की योजनाओं के अधीनता में रहता है। मनुष्य का हृदय और आत्मा परमेश्वर के हाथ में है और मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन परमेश्वर की आंखों के सामने है। चाहे आप इस बात पर विश्वास करें या न करें, परमेश्वर के विचारों के अनुसार सभी चीजों में, चाहे वे जीवित हों या मृत, बदलाव, परिवर्तन, नवीनीकरण और विलोपन परमेश्वर की इच्छा से होता है। इस प्रकार से परमेश्वर सभी बातों पर शासन करता है।

20 सित॰ 2017

मार्ग... (1)


मार्ग... (1)


अपने जीवनकाल में कोई भी व्यक्ति नहीं जानता है कि वह किस तरह की बाधाओं का सामना करने जा रहा है, न ही उसे पता होता है कि वह किस प्रकार के शुद्धिकरण के अधीन होगा। कुछ के लिए यह उनके काम में है, कुछ के लिए यह उनके भविष्य की संभावनाओं में है, कुछ के लिए यह उनके मूल परिवार में है, और कुछ के लिए यह उनके विवाह में है। लेकिन उनमें जो भिन्न है वह है कि आज हम, लोगों का यह समूह, परमेश्वर के वचन के लिए पीड़ित हैं। अर्थात्, जैसे कि कोई जो परमेश्वर की सेवा करता हो, उसने उसमें विश्वास करने के मार्ग पर बाधा का सामना किया हो, और यही वह रास्ता है जो सभी विश्वासी लेते हैं और यह हम सभी के पैरों के नीचे की राह है। यह इसी बिंदु से है कि हम परमेश्वर पर विश्वास करने के अपने मार्ग को आधिकारिक रूप से आरंभ करते हैं, मनुष्य के रूप में अपने जीवन पर से पर्दा उठाते हैं, और जीवन के सही मार्ग पर प्रवेश करते हैं। अर्थात्, जब मनुष्यों के साथ-साथ जीने वाले परमेश्वर के सही रास्ते पर हम प्रवेश करते हैं, तो ऐसा तब होता है कि सामान्य लोग भी उस पर चलते हैं। जैसे कि कोई जो परमेश्वर के सामने खड़ा होता है और उसकी सेवा करता है, कोई जो मंदिर में एक पुजारी की पोशाक पहनता है, कोई जिसमें दिव्य गरिमा और परमेश्वर की सामर्थ्य और प्रताप है, मैं सभी लोगों के लिए निम्नलिखित घोषणा करता हूँ। यह स्पष्ट हो जाना चाहिए: परमेश्वर की आनंददायक मुखाकृति मेरी महिमा है, उसकी प्रबंधन योजना मेरा सार है। मैं आने वाली दुनिया में सौ गुना प्राप्त करने का प्रयास नहीं करता हूँ, बल्कि केवल इस दुनिया में परमेश्वर की इच्छा पूरी करने का प्रयास करता हूँ ताकि मेरे द्वारा शरीर से किए गए थोड़े प्रयासों के कारण परमात्मा पृथ्वी पर अपनी महिमा के एक छोटे से अंश का आनंद ले सकें। यही मेरी एकमात्र इच्छा है।

1. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण करना क्या है? अगर कोई केवल प्रभु के लिए मिशनरी (धर्म-प्रचार सम्बन्धी) काम करता है, तो क्या यह परमेश्वर की इच्छा का पालन करना है?

XVIII. परमेश्वर की इच्छा का अनुसरण क्या है और परमेश्वर में विश्वास की सच्ची गवाही क्या है, इस पर हर किसी को स्पष्ट रूप से सहभागिता करनी चाह...